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- N. Raghuraman Column: Trusts Magical Power A Firefighter & Diamond Story
5 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
भरोसा और निरंतरता ऐसे अदृश्य धागे हैं, जो इंसानी रिश्तों को जोड़ते हैं। जब आप इन्हें स्वयं महसूस करें तो ये न सिर्फ एक कनेक्शन, बल्कि अटूट रिश्ता बना देते हैं। अपने करियर और निजी जीवन में मैंने पाया है कि भरोसा महज कहने से नहीं, बल्कि निरंतरता की आग में तप कर मजबूत बनता है।
कई दशक पहले एक हाई-स्टेक जॉब इंटरव्यू में मुझसे कहा गया कि मैं खुद को दो-तीन शब्दों में व्यक्त करूं। बगैर हिचकिचाहट मैंने कहा ‘मैं एक फायरफाइटर हूं।’ मेरी रचनात्मकता परखने के लिए एचआर हेड अरूप गुप्ता कुटिल मुस्कान के साथ बोले, ‘अगर तुमसे इस लाइन में एक शब्द और जोड़ने को कहूं तो वो क्या होगा?’ स्पष्टत: उन्हें किसी डेकोरेटिव, ‘गुड’ या ‘एफिशिएंट’ जैसे सामान्य-से विशेषण की उम्मीद थी, लेकिन मैंने उन्हें एक व्यावहारिक सच बोलकर चौंका दिया कि ‘मैं एक कंसिस्टेंट फायरफाइटर हूं।’
उनके चेहरे पर आई चमक साफ दिख रही थी। हालांकि, उन्होंने मजाकिया लहजे में यह बोल कर अपने भाव छिपाने की कोशिश की कि मैंने सिटी फायर ब्रिगेड के किसी अनुभव का जिक्र तो किया ही नहीं, लेकिन कमरे का माहौल तो साफ महसूस किया जा सकता था।
कंसिस्टेंट- इस एक शब्द ने उनका भरोसा जीत लिया। तब से बीते पैंतीस वर्षों में वैसा ही भरोसा हम दोनों के बीच बना हुआ है। प्रोफेशनल इंटरव्यू से शुरू हुआ एक रिश्ता आजीवन दोस्ती में बदल गया। यह साबित करता है कि निरंतरता ही वह बुनियाद है, जिस पर स्थायी वफादारी की इमारत टिकी होती है।
पिछले शुक्रवार, मुंबई के अंधेरी स्थित 22,000 वर्गफीट में फैले तनिष्क स्टोर में खड़े हुए मुझे यह पुरानी कहानी याद आ गई। जब मैं उस सजे-धजे शोरूम को देख रहा था तो मेरे दिमाग में हिंदी की एक मशहूर पंक्ति गूंज रही थी- ‘आईना आज फिर रिश्वत लेता पकड़ा गया। दिल में दर्द था और चेहरा हंसता हुआ पकड़ा गया।’
दरअसल, मैं भी एक झूठ में उलझ गया था- लगभग वैसे ही, जैसे दशकों पहले अरूप ने मजाकिया लहजे में बात टाल दी थी। शरारत भरी आंखों के साथ तनिष्क की चीफ मार्केटिंग ऑफिसर पेल्की त्शेरिंग ने मुझसे पूछा, ‘क्या आप टेंशन में हैं?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ लेकिन भीतर से मैं थोड़ी पसोपेश में था।
मेरी चिंता प्रश्नगत वस्तु की कीमत को लेकर नहीं थी, बल्कि अपने अतीत के सच को लेकर थी। नतीजा निगेटिव आता तो इसका मतलब होता कि दशकों तक मैं जिसे लेकर खुश होता रहा, असल में वह एक नकली चीज से ज्यादा कुछ नहीं थी। पेल्की मुझे भांप गईं। वह हंसी और मैं मुंह चुराते हुए मुस्कराया। तभी मैंने देखा कि दूर खड़े तनिष्क के सीईओ अरुण नारायण इस साइकोलॉजिकल गेम का मजा ले रहे थे।
मेरी टेंशन का कारण शादी की अंगूठी थी, जो कई वर्षों पहले ससुराल वालों ने गिफ्ट की थी। उसमें एक छोटा-सा हीरा था, राई के दाने जितना। तीस वर्षों तक मैंने अपने फैमिली ज्वेलर की बात पर भरोसा किया था।
आज वही अंगूठी ऐसी अत्याधुनिक मशीन में थी, जो नेचुरल, लैब में बने और नकली हीरों में अंतर बताने के लिए बनी है। मुझे तीन मिनट इंतजार करना पड़ा। यह इंतजार अंतहीन-सा था, जैसे किसी सीजन फिनाले के दौरान डिजिटल स्क्रीन की बफरिंग देखना होता है।
तीसरे मिनट में मशीन का फैसला आया- ‘नेचुरल’। मुझे राहत मिली। आईने में मेरी परछाई बदल चुकी थी। पेल्की मेरी जीत भांप कर पास आईं और जोर से बोलीं- ‘दे ताली’। हमने हाई-फाइव किया।
मन में अपने फैमिली ज्वेलर को धन्यवाद देते हुए मैं अरुण के पास गया और मेरे भरोसे को वैज्ञानिक आधार देने के लिए धन्यवाद कहा। शायद इसी वजह से इस ब्रांड ने यह निर्णय लिया हो कि वह उनके आउटलेट पर आने वाले हर आम आदमी को यह तकनीकी मुहैया कराकर उन्हें एक वास्तविक अनुभव देगा।
फंडा यह है कि जब वादों को अनुभव के जरिए प्रमाणित किया जाता है, तो रिश्ता अटूट बन जाता है- फिर वह दोस्तों के बीच हो या किसी ब्रांड और ग्राहक के बीच।
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एन. रघुरामन का कॉलम: भरोसे की जादुई ताकत : एक फायरफाइटर और हीरे की कहानी


