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लगभग तीन दशकों से मेरा हर शनिवार एक ही तरह से शुरू होता आ रहा है। डिजिटल अलार्म दखल दे, इससे पहले ही मैं जाग जाता हूं। पूरा घर भोर की खास मखमली शांति में लिपटा रहता है। मैं एक कप फिल्टर कॉफी बनाता हूं और एक शांत कोने में बैठ जाता हूं। मद्धम रोशनी में फोन के साथ बैठे हुए मैं अपने 88 वर्षीय मामा के कनेक्ट होने का इंतजार करता हूं। जब से उनका सुनना कम हुआ है, हमारे बातचीत वाले फोन कॉल्स वॉट्सएप की शांत, चमकती दुनिया में बदल गए हैं। स्क्रीन की हल्की नीली रोशनी किसी को परेशान नहीं करती। मेरे पेट्स को भी नहीं, जो हल्की-सी हरकत के प्रति भी संवेदनशील होते हैं। वे नींद में डूबे रहते हैं। उनकी नजर में हम ‘कुछ भी उपयोगी’ नहीं कर रहे होते, लेकिन हम अपनी जिंदगी थामे बैठे होते हैं। हम दोनों सिर्फ इतना जानना चाहते हैं कि हमारे परिवार शारीरिक और भावनात्मक रूप से ठीक तो हैं ना। अकसर हम कोई बात नहीं करते, फिर भी हर बात कर लेते हैं। उनके बच्चे, यानी मेरे कजिन विदेश में रहते हैं और अकसर मजाक में कहते हैं कि उनके पिता उनसे ज्यादा मुझसे बात करते हैं। वे छेड़ते हैं कि असल में तो मैं ही उनके पारिवारिक घर में रहता हूं। मामा मुझे 1940-50 के दशक में ले जाते हैं और मेरी मां की युवावस्था की यादें बताते हैं। वे मां के स्कूल जाने, कुकिंग और सिलाई सीखने और उनमें मौजूद करुणा के बारे में बताते हैं और उनके शब्द सदा के लिए मेरी स्मृति में दर्ज हो जाते हैं। वे बताते हैं कि कैसे मां दिव्यता जैसी सतर्कता से अपने भाइयों की देखभाल करती थीं। सुनिश्चित करती थीं कि वे भली प्रकार भोजन और आराम करें। भाइयों को थकान महसूस होने से पहले ही वे इसे समझ जाती थीं। मामा 1940-50 के दशक के दृश्य सुनाते रहते हैं, जब तक कि मैं अपने बचपन की स्मृतियों तक नहीं पहुंच जाता, मानो यादें ओलिंपिक की किसी रिले मशाल की तरह एक से दूसरे को थामे आगे बढ़ रही हों। मैं अकसर शब्दों में जवाब नहीं देता। जरूरत भी नहीं होती। स्क्रीन पर ‘ब्लू टिक’ देख वे समझ जाते हैं कि मैं वहां हूं, हर शब्द भीतर उतार रहा हूं। अचानक स्क्रीन पर एक सवाल आता है- ‘क्या तुम रो रहे हो?’ जवाब देने में मुझे कुछ सेकंड लगते हैं। वे मुझे रंगे हाथों पकड़ चुके होते हैं। भावनात्मक जुड़ाव के जरिए वे उस अहसास को छू लेते हैं, जिसे शायद मैं छिपा रहा था। वे भाई-बहनों के प्रति मां की करुणा और त्याग की बातें साझा करते हैं। त्याग और बढ़ती उम्र के दर्द की स्वीकारोक्ति करते हैं। इन भावनाओं को शायद फोन पर नहीं संभाला जा सकता। कभी-कभी वे वही कहानी दोहराते हैं, जो छह महीने पहले सुनी थी- लेकिन मैं उन्हें कभी नहीं रोकता। दोबारा सुनाने के आनंद को मैं कभी उनसे छीनना नहीं चाहता। अब मुझे एक अनजाना डर सताने लगा है। जब भी उनकी अस्वस्थता के बारे में सुनता हूं तो सबकुछ छोड़कर चेन्नई पहुंच जाता हूं। मेरे कजिन सही थे। मैं उनके घर का हिस्सा बन चुका हूं। लेकिन पहुंचते ही उन्हें गले लगाने की खुशी थोड़ी देर ही रहती है, क्योंकि जल्द ही विदाई का बोझ उस पर भारी पड़ जाता है। प्रेम का अर्थ हमेशा करीब रहना ही नहीं, कभी-कभी इसे बार-बार दोहराना भी है। हम जानते हैं कि एक दिन यह सब खत्म हो जाना है, बगैर यह पूछे कि मैं तैयार भी हूं या नहीं। फिलहाल, इतना काफी है कि यह साधारण-सी बातचीत, जो कभी हमारे रिश्ते की भावना पर और कभी मां की यादों पर केंद्रित होती है- सिर्फ शांति के भाव पर ही ले जाती है। क्या इसे ही वैलेंटाइन कहते हैं? मुझे नहीं पता। फंडा यह है कि प्यार के कई रूप हैं और इसे जताने के लिए शायद ही किसी बड़े मंच की जरूरत होती है। उसे किसी एक खास दिन या एक ही तरीके से जताना जरूरी नहीं। यह कभी भी दिखाया जा सकता है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: प्रेम के कई रूप हैं, इसे किसी भी तरह से व्यक्त कर सकते हैं


