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- N. Raghuraman’s Column Only The Two Wheels Of Patience And Confidence Accelerate Success
34 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
सात साल की उम्र में भी उस लड़की के दिल में धधक रही आग उसके बगल की झोपड़ी में लगी आग से कहीं ज्यादा बड़ी थी। जब उसकी झोपड़ी पर बुलडोजर की कार्रवाई चल रही थी तो बगल वाली झोपड़ी अचानक जलने लगी।
आम्बेडकरनगर, प्रयागराज की वह छोटी लड़की अपनी सबसे कीमती चीज को बचाने के लिए तुरंत झोपड़ी के अंदर भागी। नहीं, वह उसका छोटा भाई नहीं था, जैसा कि आपने सोचा होगा। उसे बचाने के बाद उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
वह चीज उसके स्कूल बैग में थी। नहीं, वह कोई पालतू जानवर भी नहीं था जैसा कि आपने कल्पना की होगी। शिक्षकों और ग्रामीणों द्वारा उसे परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद उसे वह उपहार दिया गया था! और वह जानती थी कि यह उपहार उसके लक्ष्य तक पहुंचने यानी एक आईएएस अधिकारी बनने का एकमात्र तरीका है।
हां, अब आपका अनुमान सही है। यह उसकी कक्षा पहली की किताबें थीं। उस लड़की का नाम अनन्या यादव है, जो अशिक्षित दिहाड़ी मजदूरों के परिवार से स्कूल जाने वाली पहली व्यक्ति है। उसका छोटा भाई आदर्श भी उसकी ही तरह अब स्कूल जाने लगा है। अनन्या को अपना स्कूल बैग पकड़े हुए झोपड़ी से बाहर भागते हुए दिखाने वाला एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। उस समय उसका पूरा परिवार दस्ते द्वारा तोड़ी जा रही झोपड़ी का बचाव कर रहा था।
एक आईएएस अधिकारी उसके स्कूल में आए और अनन्या उससे प्रभावित हुई थी। तब से उसने तय कर लिया था कि उसे अपने जीवन में क्या बनना है। इस उम्र में उसे शायद आईएएस का फुल फॉर्म भी नहीं पता होगा और शायद यह भी नहीं मालूम होगा कि आईएएस कैसे बना जाता है, लेकिन उसे खुद पर भरोसा था कि वह भविष्य में आईएएस बनेगी।
यही वजह है कि उसने अपनी किताबें संभाल कर रखीं। किताबें थामे दौड़ते हुए उसके वीडियो ने न केवल कई दिलों को पिघलाया और कई लोगों को भावुक किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रयागराज में इस बुलडोजर-कार्रवाई की निंदा करते हुए अपने मंगलवार के आदेश में इस घटना का हवाला दिया।
यकीन मानिए, अगर किसी ने मेरे मित्र हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी को यह घटना सुनाई होती, तो वो जरूर इस घटना का इस्तेमाल अपनी किसी फिल्म में एक सफल नायिका के पांच मिनट के फ्लैशबैक के रूप में करते। इसके साथ ही वे अपना दृष्टिकोण भी पेश करते कि कैसे हमारे गांवों में देश चलाने के लिए सबसे अच्छे अधिकारियों को तैयार करने की अपार क्षमता है।
ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे भी ऐसी ही पृष्ठभूमि से आए थे। उन्होंने खुद राज्यसभा टीवी के एक कार्यक्रम “गुफ्तगू’ में कहा था कि “बहुत रोता हुआ बचपन था।’ हां, ऐसा ही था। जब वे सिर्फ 10 साल के थे, तब पूरा देश विभाजन की त्रासदी का सामना कर रहा था।
उत्तरी पाकिस्तान के एबटाबाद में जन्मे गोस्वामी और उनके परिवार ने दिल्ली में किंग्सवे कैंप और हडसन लाइन की रिफ्यूजी कॉलोनियों में शरण ली। विभाजन के दंगों के दौरान उन्होंने दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में अपने भाई कुकू को खो दिया।
इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई की। दिल्ली के हिंदू कॉलेज से स्नातक होकर हरिकृष्ण 1956 में बॉम्बे (अब मुंबई) पहुंचे। वे लंबे, गोरे और खूबसूरत थे, लेकिन रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोते थे, पुलिस की मार खाते थे, गालियां सुनते थे। पर उन्हें कभी खुद पर डाउट नहीं था कि वे फिल्मों में हीरो बन सकते हैं।
उन्होंने निर्देशक लेखराज भाकरी की “फैशन’ (1957) में एक छोटी-सी भूमिका से शुरुआत की। विजय भट्ट की सोशल ड्रामा “हरियाली और रास्ता’ (1962) में सफल होने से पहले वे कई फ्लॉप फिल्मों से उबरे। इस शुक्रवार को देश ने इस महान शख्सियत को खो दिया। बॉलीवुड इंडस्ट्री उन्हें मनोज कुमार के नाम से जानती है, जिनकी देशभक्ति का जज्बा हमेशा याद रखा जाएगा।
फंडा यह है कि आप बचपन में अपने लिए जो कुछ भी चाहते हैं, अगर उसे हासिल करना चाहते हैं तो आपके पास खुद को प्रेरित करने के लिए दो पहिए होने चाहिए- 1. खुद पर विश्वास और 2. धैर्य।
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एन. रघुरामन का कॉलम: धैर्य और आत्मविश्वास के दो पहिए ही सफलता को गति देते हैं