एन. रघुरामन का कॉलम: डेटिंग की अर्थव्यवस्था ‘सोल्जर पेमेंट’ से ‘ब्यूटी टैक्स’ तक बढ़ चुकी है Politics & News

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11 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

डेट का बिल किसे चुकाना चाहिए, इस पर बहस उतनी ही पुरानी है जितनी खुद डेटिंग। 1980 के दशक में जब मैं युवा और अविवाहित था तो दोस्तों के बीच अकसर इस विवाद के केंद्र में रहता था। मेरे सहकर्मी अपने रोमांटिक मसलों के खर्च के लिए मुझसे उधार लेते थे। मैं शायद ही कभी मना करता, लेकिन ‘सोल्जर पेमेंट’ का सुझाव देने का मौका भी नहीं छोड़ता- यानी हर व्यक्ति अपने खाने का खर्च खुद दे।

मेरे इस सुझाव का तत्काल विरोध होता। वे चेतावनी देते कि ‘यकीन मानो, इस सोच के साथ तुम कभी शादी नहीं कर पाओगे।’ महीने के अंत में जब हम एक प्रिंटिंग प्रेस की टूटी बेंचों पर बैठकर ‘कटिंग चाय’ पी रहे होते, क्योंकि यही हम अफोर्ड कर सकते थे- तो वे मुझे प्रेमालाप का ‘ज्ञान’ देते।

लॉजिक सीधा-सा होता था- प्रमुखत: पुरुष ही कमाने वाले और भविष्य में घर चलाने वाले होते हैं। वे तर्क देते कि डेट का बिल चुका कर पुरुष अपनी क्षमता प्रदर्शित करता है कि अब वह शादी के लिए तैयार है। अब 2026 पर आते हैं। हालात काफी बदल चुके हैं, फिर भी हैरतअंगेज तरीके से मूल अपेक्षाएं वहीं अटकी हैं।

आज महिलाएं कहीं ज्यादा शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं। कई महिलाएं (सारी नहीं) पारंपरिक पारिवारिक दबाव से मुक्त अपने दम पर काम करती हैं। फिर भी यही रिवाज बना हुआ है कि पुरुष ही पहली डेट का बिल चुकाए। दिलचस्प यह है कि पुरुष के ‘घर चलाने’ वाले दर्जे की बराबरी अब महिलाओं का ‘ब्यूटी टैक्स’ करने लगा है।

‘ब्यूटी टैक्स’, यानी तेजी से बढ़ता वो खर्च, जो महिलाएं समाज के आधुनिक सौंदर्य मानकों को पूरा करने के लिए करती हैं। प्रोफेशनल मैनीक्योर और पेडीक्योर से नियमित वैक्सिंग और हेयर स्टाइलिंग तक, अपनी अपियरेंस बनाए रखने की ‘रनिंग कॉस्ट’ को इसकी वजह बताया जाता है कि क्यों पुरुष बिल चुकाएं। इस नजरिए से महिला तो रेस्तरां पहुंचने से पहले ही अपना आर्थिक योगदान दे चुकी होती है।

हालिया सर्वे बताते हैं कि यही सोच पारंपरिक मर्दानगी के नियमों के साथ मिल कर तय करती है कि डेटिंग आज भी काफी हद तक जेंडर संबंधी पैटर्न पर ही चलती है। इसके पीछे का मनोविज्ञान दिलचस्प है।

एक सर्वे बताता है कि 30% महिलाएं पुरुषों द्वारा बिल चुकाने को ‘इन्टेंशनल डेटिंग’ का संकेत मानती हैं। उनके लिए यह पैसे का प्रदर्शन नहीं, बल्कि इसका संकेत है कि पुरुष ने उन्हें चुना है और वह रिश्तों में निवेश को तैयार है। वहीं, 17% महिलाओं का तर्क है कि अगर रिश्ते में गंभीरता हो तो बिल बांट लेना बेहतर रास्ता है।

सबसे चौंकाने वाला यह है कि 67% पुरुष अब भी मानते हैं कि सामाजिक शिष्टाचार में पहली आउटिंग का भुगतान उन्हें ही करना चाहिए, भले ही वे साथ जा रही महिला से कम कमाते हों। इससे मुझे अपने जीवन का एक निजी वाकिया याद आ गया। एक छोटे-से दौर में मेरी आय पत्नी से 250 रुपए कम थी। मुझे घर पर खाने की किफायत पसंद थी और इसका मेरी कमाई से कोई लेना-देना नहीं था।

लेकिन पत्नी को महीने में कम से कम एक बार आउटिंग अच्छी लगती थी। आदत के मुताबिक उन डिनरों में मैं सादी खिचड़ी या कर्ड राइस ही ऑर्डर करता था। शुरू में उन्हें लगा कि मेरा सादा खाना बाहर जाने के खिलाफ मूक विरोध है। हालांकि समय के साथ उन्हें समझ आ गया कि यह सहज तौर पर मेरी पसंद है।

उन्होंने ऐसे खाने का पैसा देने में कभी अफसोस नहीं किया और मुझे भी कभी हीन भावना नहीं हुई। डेटिंग का बुनियादी उद्देश्य है कि आप सामने वाले को महसूस कराएं कि उसे आपने ‘चुना’ है। आप उनके समय और मौजूदगी की कद्र करते हैं। चाहे ‘सोल्जर पेमेंट’ हो या ट्रेडिशनल ट्रीट- इसमें व्यक्ति में निवेश का भाव दिखना चाहिए, विवाद का कारण नहीं।

फंडा यह है कि डेट का भुगतान करना पैसे के लेन-देन की नहीं, बल्कि मूल्यों और पारस्परिक सम्मान की बात है।

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