एन. रघुरामन का कॉलम: ‘टूल-बेल्ट’ जनरेशन का फैशन स्टेटमेंट हमारी जनरेशन से उलट है Politics & News

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हाल ही में अमेरिका रहने वाली मेरी बहन ने मुझे 28 डॉलर की काउबॉय हैट गिफ्ट की। यह इसीलिए अलग नहीं थी कि उसने धूप से बचने के लिए मेरा पूरा चेहरा ढक दिया था, बल्कि जैसे जूतों के छेदों में फीता बंधा होता है, वैसे ही उस हैट के चारों तरफ फीता बंधा था। उस हैट में भी चारों ओर छेद थे। जैसे ही आप फीता खोलते हैं तो हैट के भीतर से एक मच्छरदानी खुल कर चेहरे और गर्दन को ढक लेती है, जिसे आप शर्ट के कॉलर में घुसा कर बटन लगा सकते हैं। बहन ने मेरा एक वीडियो देखा था, जिसमें मैं घूम रहा हूं और मच्छर मुझे काट रहे हैं। इसके बाद उसने यह हैट खरीदी। तब से यह रात को बाहर जाते वक्त मेरा पसंदीदा पहनावा बन गई, क्योंकि तब मच्छरों के काटने की संभावना होती है। यह मेरे गंजे हो रहे सिर को कवर करती है, फैशनेबल है और सबसे ज्यादा मच्छरों से बचाव करती है। भले कुछ लोग मुझे अजीब नजरों से देखते हैं, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता- क्योंकि कुछ हद तक यह मुझे संभावित बीमारियों से बचाती है। अभी तक मुझे पता नहीं था कि इस हैट को पहनकर मैं एक ‘टूल-बेल्ट जनरेशन फैशन प्रमोटर’ बन गया। अब ये क्या है? यह उन लोगों का फैशन है, जो शारीरिक श्रम करते हैं और ऐसे आरामदायक कपड़ों व बेहतर टूल्स पर खर्च करने को तैयार रहते हैं, जो सुरक्षा देते हैं। मसलन, सुरक्षा मानकों वाले वर्क बूट्स। कई जेन-जी युवाओं को समझ आ रहा है कि महज ग्रेजुएट होने से ज्यादा कमाई मैकेनिक, प्लंबर या इलेक्ट्रीशियन बन कर हो सकती है। ऐसे में वे शारीरिक श्रम वाले कार्यबल में शामिल हो रहे हैं। इसीलिए उन्होंने ऐसे कपड़े और फैशन चुने हैं, जो उनके काम की प्राथमिकताओं के लिहाज से अधिक फ्लेग्जिबल हों। और जो लोग ऐसे फंक्शनल फिट कपड़े पहनने हैं, उन्हें ‘ट्रेड्सपीपल’ कहा जाता है। आज ट्रेड्सपीपल सिर्फ वहीं लोग नहीं, जो नीली यूनिफॉर्म पहनकर वर्कशॉप पर रहते हैं। पिछले चार वर्षों में शॉप फ्लोर का बड़ा कार्यबल बन चुके जेन-जी युवा भी सिर्फ काम पर आते-जाते वक्त ही नहीं, बल्कि वर्कप्लेस पर भी फैशनेबल दिखना चाहते हैं। इस वजह से इन परिधानों की चाहत अब ब्लू कॉलर संस्कृति से आगे बढ़ चुकी है। ब्रंट, लोव्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड न सिर्फ दुनिया भर में स्टोर्स खोल रहे हैं, बल्कि ब्रांड-बिल्डिंग कंपनियों के जरिए ‘वर्कवेयर में निहित लेगेसी’ को भी बता रहे हैं। विदेशों में इन्हें कोई महज वर्कर्स नहीं कह सकता, बल्कि वहां उन्हें ‘स्ट्रीटवेयर कम्युनिटीज’ कहा जाता है। ये वर्कवेयर उन लोगों के लिए हैं, जो इन्हें फैशन प्रोडक्ट की तरह नहीं, बल्कि इक्विपमेंट्स की तरह इस्तेमाल करते हैं। वर्कवेयर आज अपेरल और फुटवियर इंडस्ट्री का सबसे तेजी से बढ़ता सेगमेंट है, जिसकी कीमत कई सौ मिलियन डॉलर है।
‘बकेट टॉक’ नाम का एक पॉडकास्ट है, जो वेल्डर्स, प्लंबर्स, किसानों और यूटिलिटी लाइनमैन जैसे लोगों के लिए है। इसमें देख सकते हैं कि कैसे लोग हल्के, ज्यादा आरामदायक कपड़ों की ओर जा रहे हैं। ये कपड़े अलग-अलग मौसम और हाइजीन कंडीशंस में काम करने में मददगार भी हैं। याद करें कि कॉलेज के दिनों में हम में से कई बस में एप्रन पहनकर चलते थे, मानो हम मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हों, जबकि हम बीएससी या एमएससी छात्र होते थे। उसी तरह आज यह टूल-बेल्ट जनरेशन अपने आधुनिक स्ट्रीटवेयर पहनकर आराम से बस स्टैंड और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जा रही है। वे दिन लद गए जब हम दूसरों को दिखाने के लिए कपड़े पहनते थे। टूल-बेल्ट जनरेशन मानती है कि ‘माई कम्फर्ट, कम्स फर्स्ट’। और इसमें कुछ गलत भी नहीं। उनकी नई कार्गो पैंट्स हमारी उम्र की सख्त कैनवास पैंट्स से कहीं स्ट्रेची हैं। मैं देखता हूं कि सोशल मीडिया पर भी ये युवा अपने आराम को प्राथमिकता देते हुए मैकेनिक, प्लंबर और इलेक्ट्रीशियंस के जूते और परिधान पहन रहे हैं।

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एन. रघुरामन का कॉलम: ‘टूल-बेल्ट’ जनरेशन का फैशन स्टेटमेंट हमारी जनरेशन से उलट है