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एक पुरानी मोरल स्टोरी याद करें, जिसमें कई प्रशिक्षित मैकेनिकों के विफल होने के बाद एक बड़ी-सी मशीन ठीक करने के लिए साधारण-से आदमी को बुलाया जाता है। लगभग एक घंटे तक मशीन की जांच-परख करने के बाद वह एक जगह पर एक बार हथौड़ा मारता है और मशीन चल पड़ती है। वह मशीन चालू करके ही नहीं, बल्कि दस हजार रुपए का बिल थमा कर भी मालिक को चौंका देता है। जब पूछा जाता है कि एक बार हथौड़ा मारने के इतने पैसे क्यों? तो वह आत्मविश्वास से कहता है कि ‘एक बार हथौड़ा मारने का चार्ज तो एक रुपया ही है, लेकिन कहां मारना है इसकी जानकारी रखने का चार्ज 9,999 रुपए है।’ यूपी से लेकर कर्नाटक के बेंगलुरु और महाराष्ट्र के पुणे से लेकर हरियाणा के बड़े हिस्से तक अभी बिलकुल यही खेल चल रहा है। कई शहरों के बाहरी इलाकों में, जहां पहले खेती ही मुख्य अर्थव्यवस्था थी और मानसून ही भाग्य का फैसला करता था- वहां के जमीन मालिक अब स्पोर्ट्स आंत्रप्रेन्योर बन कर सोच से परे पैसा कमा रहे हैं। जी हां, जो किसान कभी अपनी जमीन को हरा-भरा रखने के लिए संघर्ष करते थे, वे अब उसे ब्राउन कलर (सूखा) में रख रहे हैं। जैसे-जैसे क्रिकेट स्ट्रक्चर्ड कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल का हिस्सा बन रहा है तो खुले मैदानों की मांग सैकड़ों गुना बढ़ गई है। हजारों रुपए में महज मैदान ही किराए पर नहीं दिए जाते, बल्कि हर मैदान स्कोरर, अंपायर, ग्राउंड्समैन, टर्फ मैनेजर, हेल्पर, बुकिंग कोऑर्डिनेटर, कोच, फोटोग्राफर, कैटरर और इवेंट स्टाफ को भी रोजगार देता है। मैच के दिनों में आसपास के गांवों के सब्जीवाले, जूस विक्रेता और छोटे व्यापारी भी खाने-पीने की चीजें बेचकर अच्छा कारोबार कर लेते हैं। दिलचस्प यह है कि हर साल अक्टूबर से मई तक ये मैदान अपने आप में एक मिनी इकोनॉमिक जोन बन जाते हैं। इस व्यवसाय का बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट क्रिकेट से आ रहा है। वर्किंग प्रोफेशनल्स द्वारा अच्छी विकेट, सही अंपायर और व्यवस्थित फिक्स्चर की सुविधाएं लेने के लिए आपस में खर्चा बांट कर वीकेंड टूर्नामेंट खेले जाते हैं। जो शुरुआत में एक री-क्रिएशनल ट्रेंड था, धीरे-धीरे समानांतर खेल अर्थव्यवस्था में बदल गया। जिन स्मार्ट लोगों ने फ्रीलांस अंपायरिंग और स्कोरर का काम शुरू किया, उन्हें सबसे ज्यादा कॉल आते हैं। वीकेंड पर वे कभी-कभी डबल शिफ्ट भी कर लेते हैं। फ्रीलांसर मैचों की उपलब्धता के आधार पर जहां 1,500 से 4,000 रुपए तक कमा लेते हैं, वहीं ग्राउंड्समैन, बुकिंग कोऑर्डिनेटर और फोटोग्राफर भी प्रति मैच 1,500 रुपए से कम नहीं कमाते। दूसरी ओर, जो किसान पहले उपज की बिक्री से सालाना 2-3 लाख रुपए कमाते थे, अब हर साल 10 लाख कमा रहे हैं। दुनिया में 4 करोड़ यूजर्स द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले क्रिकेट स्कोरिंग और नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म ‘क्रिकहीरोज’ के डेटा के अनुसार करीब 4 हजार क्रिकेट ग्राउंड उसके प्लेटफॉर्म पर रजिस्टर्ड हैं। यह दिखाता है कि तेजी से आबाद हो रहे शहरों के पास पर्याप्त जमीन रखने वाले किसानों के लिए कैसे निजी क्रिकेट इंफ्रास्ट्रक्चर एक नया बिजनेस मॉडल बन चुका है।तमिलनाडु, हरियाणा और कर्नाटक के बड़े शहरों के पास कुछ मैदान तो तीन घंटे के टी-20 स्लॉट के लिए 10 हजार रुपए तक चार्ज करते हैं, जबकि पूरे दिन की बुकिंग 50 हजार रुपए तक पहुंच जाती है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में प्रति मैच 2 से 5 हजार रुपए लिए जाते हैं, हालांकि मैचों की संख्या बढ़ती जा रही है, क्योंकि किसान सुनिश्चित करते हैं कि मैच समय पर शुरू हों और तय स्लॉट के आसपास ही खत्म हों जाएं। अकेले पुणे शहर में री-क्रिएशन के लिए 60 रजिस्टर्ड ग्राउंड हैं। सबसे ज्यादा कमाई तमिलनाडु में हो रही है, उसके बाद हरियाणा का नंबर आता है। फंडा यह है कि यह जानना ज्यादा जरूरी है कि लोहा कहां गर्म है और यह भी कि मनचाहे परिणाम पाने के लिए चोट कहां करनी है। जब चारों ओर क्रिकेट का जुनून छाया है तो लाजिमी यही होगा कि मौका रहते इसका फायदा उठा लिया जाए।
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एन. रघुरामन का कॉलम: जब लोहा गर्म है तो मार दो हथौड़ा

