एन. रघुरामन का कॉलम: जब प्रतिस्पर्धी आपको हरा दे तो उससे हाथ मिलाना ‘अक्लमंदी’ है Politics & News

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‘सर, मेरे पास एयरपोर्ट परिसर की कुछ दुकानें लीज पर हैं। एयरपोर्ट के इस अत्याधुनिक ट्रैवलर्स सीटिंग एरिया में लेदर प्रोडक्ट्स का एक भी एग्जीबिटर नहीं है। क्या आप मुझे अपने किसी लेदर मैन्युफैक्चरर दोस्त से मिलवा सकते हैं, ताकि मैं उनसे हाथ मिलाकर एयरपोर्ट पर ऐसा आउटलेट शुरू कर सकूं?’ मित्र सुधांशु की फोन पर ऐसी रिक्वेस्ट सुनकर मुझे बिजनेस को लेकर उनकी समझ की तारीफ करनी पड़ी। उनके आपसी फायदे के लिए मैंने तुरंत दोनों को कनेक्ट कर दिया। लेकिन वर्षों से जिस बिजनेस में आप राज कर रहे हो और उसमें आपको हराने वाले प्रतिस्पर्धी से हाथ मिला लें तो यह भी अधिक समझदारी भरी रणनीति कही जाएगी। इस रणनीति पर शक है तो मैं आपको ऐसी कहानी सुनाता हूं, जो अगले हफ्ते घटने वाली है। 1922 में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के रूप में शुरू हुई यह संस्था 1927 में एक पब्लिक कॉर्पोरेशन बनी और इसने रेडियो के जरिए न्यूज बिजनेस में प्रमुख भूमिका निभाई। 1936 में जब यह दुनिया की पहली नियमित हाई-डेफिनिशन पब्लिक टेलीविजन सर्विस बनी तो वर्षों तक अकेली ऐसी सेवा-प्रदाता रही, जिसने लोगों की ‘व्यूइंग हैबिट’ को गढ़ा। दुनिया की बदलती व्यूइंग हैबिट में इसका खास योगदान रहा। मुझे नहीं पता कि यह कछुआ-खरगोश की कहानी वाला खरगोश बनकर सो गई या फिर पूरी ताकत से लड़ने के बावजूद भी प्रतिस्पर्धी को हरा नहीं पाई। लेकिन ‘व्यूइंग हैबिट’ में लगातार हो रहे बदलावों में इसने अपनी लीडरशिप पोजिशन गंवा दी। जैसे ही यह दूसरे नंबर पर पहुंची (आपका मन पूछ रहा होगा कि पहला कौन है, तो जरा सब्र करो, बताऊंगा) तो इसने पहले नंबर वाले से हाथ मिलाने का फैसला किया। इसने उस प्रतिस्पर्धी के लिए बेस्पोक प्रोग्राम्स (किसी संगठन या उसके यूजर्स की सटीक और खास जरूरतों के लिए शुरुआत से ही कस्टम बिल्ट किया गया यूनीक एप्लीकेशन) बनाने पर सहमति दी, जिसने पिछले महीने ही इसे पछाड़ दिया था। यूके मीडिया में चर्चा है कि अब बीबीसी ऐसे प्रोग्राम्स बनाएगा, जो युवाओं और बच्चों के लिए स्क्रिप्ट किए गए हैं। आपने अंदाजा लगा लिया है कि उसे किसने हराया तो खुद को शाबाशी दे सकते हैं। स्वतंत्र रेटिंग बॉडी ‘बॉडी बार्ब’ के अनुसार दिसंबर 2025 में यूके में यूट्यूब ने 51.9 मिलियन लोगों तक पहुंच बनाई, जबकि कुछ मेट्रिक्स में बीबीसी को 50.9 मिलियन दर्शक मिले। ऐसा नहीं कि बीबीसी ने यूट्यूब से पोजिशन में हारने के बाद यह फैसला किया। अगस्त 2025 से ही इसकी प्लानिंग चल रही थी, क्योंकि जमीन खिसकने के संकेत मिलने लगे थे। इससे बीबीसी के कर्ताधर्ताओं को समझ आ गया कि सभी दर्शकों को अपने प्रोग्राम्स से जोड़ने की उनकी कोशिशें कमजोर पड़ रही हैं। बीबीसी में काम कर चुके एक इनसाइडर ने कहा कि ‘वो दिन लद गए जब यूट्यूब सबका दुश्मन होता था। अब यह विशाल लैंडस्केप का बड़ा हिस्सा बन चुका है और बीबीसी समझ चुका है कि उसे भी इसमें शामिल होना पड़ेगा।’ यूके के नागरिकों के लिए ये शोज बिना विज्ञापन, जबकि ग्लोबल ऑडियंस के लिए विज्ञापन सहित होंगे। हालिया रिपोर्ट्स एक साझेदारी का संकेत देती हैं, जिसमें यूट्यूब पर बीबीसी कॉन्टेंट में हॉलीवुड अभिनेता विल स्मिथ के साथ कोलैबोरेशन दिखाया गया है। इसमें रैप परफॉर्मेंस और प्रमोशनल कॉन्टेंट शामिल हैं। ये प्रमोशनल, शॉर्ट-स्निपेट वीडियोज यूट्यूब पर बहुत-सा इंगेजमेंट ला रहे हैं। मैंने खुद यूट्यूब पर इस बारे में कई प्रमोशन देखे हैं और आप भी देख सकते हैं। कई बिजनेस एक्सपर्ट्स मानते हैं कि थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म्स पर अपना कॉन्टेंट दिखाने से बीबीसी को युवा दर्शक मिलेंगे और इससे उसे अतिरिक्त फायदे भी होंगे। 2024-25 में 35 साल से कम उम्र के लोगों ने जितने समय वीडियो देखे, उसमें से 44% समय यूट्यूब समेत अन्य वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म्स पर बिताया। यह सभी ब्रॉडकास्टर्स पर बिताए कुल 27% और नेटफ्लिक्स के 29% प्रतिशत से भी ज्यादा है। फंडा यह है कि कस्टमर की पसंद उतनी ही तेजी से बदल रही है, जैसे हम कपड़े बदलते हैं। ऐसे में टिकाऊ बिजनेस का सबसे समझदार तरीका यही है कि ऐसे प्रतियोगी से भी हाथ मिला लो, जिसने हमें हराया हो।

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एन. रघुरामन का कॉलम: जब प्रतिस्पर्धी आपको हरा दे तो उससे हाथ मिलाना ‘अक्लमंदी’ है