एन. रघुरामन का कॉलम: क्या याददाश्त की समस्याएं हमारी युवा वर्कफोर्स को प्रभावित कर रही हैं? Politics & News

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20 साल से एक ही परिवार के साथ काम कर रहे 39 वर्षीय ड्राइवर को तीन काम सौंपे गए। दोस्त के घर से पार्सल लेना, फिर किराने की तीन चीजें खरीदना और लौटते वक्त लॉन्ड्री से कपड़े ले आना। वह बिना कपड़े लिए लौट आया। पूछने पर सहज जवाब था कि ‘भूल गया, माफ कीजिए।’ एक बार नहीं, कई मौकों पर उसने गलती की और जवाब वैसा ही था। वह उन रास्तों को भी भूलने लगा, जिन पर साल में कम से कम पांच बार जा चुका था। वह क​हता कि नई निर्माण गतिविधियां उसे भ्रमित करती हैं। एक अन्य मामले में, दो माह से एक कैम्पेन पर काम कर रहीं मध्यम आयु वर्ग की ऊंची तनख्वाह वाली यंग एग्जीक्यूटिव, ग्लोबल हेड के साथ रिव्यू मीटिंग में अचानक ‘ब्लैंक’ हो गईं। ग्लोबल हेड से यह उनकी पहली मीटिंग थी और उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना था। लेकिन एक मुश्किल सवाल का जवाब देने के बजाय वे बोलीं ‘माफ कीजिए, मेरी याददाश्त काम नहीं कर रही है।’ उपरोक्त उदाहरणों में ऐसी मेमोरी प्रॉब्लम्स के लिए उन दोनों की उम्र बहुत कम थी। चूंकि दोनों एक ही कंपनी में कार्यरत थे और उन्हें बेहतर मेडिकल सपोर्ट मिलता था तो डॉक्टरों ने जांच की और पाया कि अलग-अलग स्तर के इन दोनों कर्मचारियों में मेमोरी लॉस की समस्या है। एक अध्ययन बताता है कि 2013-2023 के बीच 40 से कम के अमेरिकी वयस्कों में सेल्फ रिपोर्टेड कॉग्निटिव अक्षमता लगभग दोगुनी हो गई है। यह केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं है। तनाव के कारण ‘ब्रेन फॉग’ और मेमोरी लॉस बढ़ रहे हैं। डेडलाइन मिस करने, एकाग्रता कम होने और छोटी-मोटी गलतियां बढ़ने के कारण कार्यस्थल पर लोगों का प्रदर्शन प्रभावित हो रहा है। याददाश्त की कमी वाले लोग वर्कफोर्स में बढ़ रहे हैं। इसके निम्न कारण हैं। बर्नआउट और कॉग्निटिव दबाव : ज्यादा तनाव से कॉर्टिसोल बढ़ता है, जो याददाश्त और ध्यान को प्रभावित करता है और मानसिक थकान होती है। ओवरवर्किंग से दिमाग में संरचनात्मक बदलाव संभव हैं और कम से कम यह मानसिक थकान तो करता ही है। घटती प्रोडक्टिविटी : याददाश्त में कमी से जानकारी दिमाग में बनाए रखना कठिन हो जाता है। इससे प्रदर्शन कमजोर होता है। कर्मचारी निर्देश याद नहीं रख पाते, मीटिंग भूल जाते हैं और काम पर नजर नहीं रख पाते। युवाओं में भी असर : मेमोरी प्रॉब्लम्स बुजुर्गों में ही नहीं, 18-39 उम्र के वयस्कों में भी बढ़ रही हैं। खासकर, कम आय और शिक्षा वाले लोगों में। विशिष्ट कारण : इन समस्याओं की वजह नींद की कमी, एंग्जाइटी, डिप्रेशन, विटामिन बी-12 की कमी और कुछ मामलों में कोविड शामिल हैं। तो हम क्या करें? जीवनशैली में बदलाव के कुछ सुझाव यहां पेश हैं। नींद को प्राथमिकता दें : हर रात 7-10 घंटे की नींद का लक्ष्य रखें, ताकि याददाश्त मजबूत हो और जानकारी कायम रह सके। ‘जुगाली’ करें, जैसे गाय खाना दोबारा चबाती है, वैसे ही सोने से पहले दिन की अहम घटनाओं को दस मिनट आंखें बंद कर दोहराएं। इससे अवचेतन मन में वह जानकारी लंबे समय तक बनी रहेगी। सजग रहें, ध्यान करें, डीप ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें और न्यूट्रिशलन सपोर्ट लें। यह डिमेंशिया के असर को कम करने में मददगार है। मल्टीटास्किंग न करें, रेगुलर ब्रेक लें और हर चीज लिखें : मल्टीटास्किंग से मेंटल फ्रिक्शन और काम की गुणवत्ता कम होती है। पहले मौजूदा काम पूरा करें। याददाश्त पर निर्भर रहने के बजाय लिखकर कार्यों की ट्रैकिंग करें। लंबे समय तक एकाग्रचित होने से मानसिक थकान होती है, इसलिए ब्रेक लें। विजुअल डिस्ट्रैक्शन कम करने के लिए फिजिकल और डिजिटल वर्कस्पेस को व्यवस्थित रखें। याददाश्त प्रभावित कर सकने वाली हाई बीपी, डायबिटीज या थायरॉयड जैसी बीमारियों को लेकर सालाना प्रो-एक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट रखें। फंडा यह है कि नियोक्ताओं को अधिक सपोर्टिव और ‘ब्रेन फ्रेंडली’ माहौल बनाना होगा, ताकि अनुभवी और प्रतिभाशाली कर्मचारियों में कॉग्निटिव गिरावट के खतरों को कम किया जा सके। हर एक एम्प्लॉई को ‘डी स्टेबलाइज’ करने के बजाय ऐसा अनुकूल माहौल बनाना होगा, जहां कर्मचारी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सके।

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एन. रघुरामन का कॉलम: क्या याददाश्त की समस्याएं हमारी युवा वर्कफोर्स को प्रभावित कर रही हैं?