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भारतीय शादियों में आजकल पारम्परिक रिवाजों और आधुनिक तकनीक का खूबसूरत तालमेल किया जा रहा है। 20 की उम्र के युवा अपनी आधुनिक शादियों में पुराने रीति-रिवाजों को बेहतरीन तरीके से शामिल कर रहे हैं, क्योंकि शायद वे इसके पीछे का विज्ञान समझते हैं। वहीं, 60 की उम्र में दोबारा शादी करने वाले जोड़े परंपराओं के साथ तकनीक अपना रहे हैं। अब आपके मन में दो सवाल आ सकते हैं। पहला, तकनीक और दूसरा 60 की उम्र में दोबारा शादी को लेकर। ये दोनों बातें उन शादियों से निकली हैं, जिनमें मैं हाल ही शामिल हुआ। 32 साल पहले जब उनकी शादी हुई तो सब कुछ परम्परागत तरीके से हुआ। अंगूठी बदलने जैसी कोई रस्म नहीं थी। इस हफ्ते उन्होंने दोबारा शादी की, जिसे तमिलनाडु में ‘षष्टियब्दपूर्ति’ कहा जाता है। इसमें अकसर जोड़े की सेहत, दीर्घायु और शांति के लिए शादी की रस्में दोहराई जाती हैं। 60 वर्ष की उम्र पूरी होने पर यह फैमिली सेलेब्रेशन होता है, जिसे 120 साल के मानव जीवन का आधा पड़ाव पूरा होने जैसा माना जाता है। इस रस्म की अहमियत जानना चाहते हैं तो मैं बताता हूं कि इसका गहरा ज्योतिषीय महत्व है। 60 वर्ष की आयु में बृहस्पति अपने 5 चक्र (12 × 5 = 60) और शनि अपने 2 चक्र (30 × 2 = 60) पूरे करता है। और इस प्रकार ये जन्म के समय की अपनी मूल ग्रह स्थिति में लौटते हैं। इसे जीवन के भौतिक चरण की समाप्ति और अधिक आध्यात्मिकता की शुरुआत माना जाता है। अकसर इसमें विवाह की रस्में वही होती हैं, लेकिन साथ बिताए जीवन के लिए ईश्वर के प्रति आभार का भाव अधिक होता है। सोच रहे हैं कि इस शादी में तकनीक कहां है? इसी पर आ रहा हूं। इस शादी में अंगूठी बदलना नया था, जो उन्होंने तब नहीं किया था। अब तपाक से यह न कहना कि ‘यह तो कोई तकनीक नहीं हुई’। अप्रत्याशित रूप से इस एक्सचेंजिंग सेरेमनी में एक आधुनिक ट्विस्ट है। हालांकि वे दोनों अपने-अपने पेशे में भली प्रकार स्थापित हैं और इसका खर्च भी उठा सकते हैं, लेकिन उन दोनों ने एक-दूसरे को सोने या प्लेटिनम की अंगूठियां नहीं पहनाईं- बल्कि तकनीक युक्त हेल्थ ट्रैकर रिंग चुनी। इसे स्मार्ट हेल्थ रिंग भी कहते हैं, जो एक-दूसरे की हार्ट रेट, ब्लड ऑक्सीजन लेवल, स्लीप मॉनिटर, कदमों की संख्या, कैलोरी जैसे स्वास्थ्य संबंधी विषयों की निगरानी करती है। शादी की सबसे अच्छी बात ये थी कि इस जोड़े ने यह बेहद गोपनीय रखा कि वे एक-दूसरे को क्या गिफ्ट देने वाले हैं। पिछले साल के अंत में मैं जयपुर की एक बिजनेसमैन फैमिली के बेटे धीमंत अग्रवाल और ध्रुवी की शादी में शामिल हुआ। जाहिर है कि यह जयपुर की एक फाइव स्टार लोकेशन पर हुई आधुनिक शादी थी। नवयुगल के स्टेज पर आने, अंगूठियां बदलने और वरमाला की रस्म पूरी करने से पहले ही अधिकांश मेहमानों को घंटियां दी गईं। ये वैसी ही थीं, जैसी हम पूजाघर में काम लेते हैं, लेकिन ये कांच की बनी थीं। जब कपल अंगूठी बदलने और वरमाला की रस्म कर रहा था तो मेहमानों से ये घंटियां बजाने को कहा गया। हमारे पूर्वज मानते थे कि मंदिर में पूजा या आरती के वक्त जब घंटियां बजती हैं तो यह ध्वनि आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर हटा कर वातावरण शुद्ध करती है। इससे दिव्य और शुभ भाव पैदा होते हैं। वे यह भी मानते थे कि ये ध्वनि तरंगें शरीर के सात चक्रों को सक्रिय करती हैं और दाएं-बाएं मस्तिष्क के बीच तालमेल बनाती है। मैंने देखा कि मेहमान घंटी बजाते हुए एक रिसेप्टिव और मेडिकेटिव ध्यान अवस्था में पहुंच गए, ताकि वे सकारात्मक ऊर्जा के साथ जोड़े को आशीर्वाद दे सकें। और यही धीमंत और ध्रुवी का उद्देश्य भी था। फंडा यह है कि जैसे हमारे युवा परंपराओं और बुजुर्ग तकनीक की ओर झुक रहे हैं, वह दिखाता है कि हमारी रस्मों के वैज्ञानिक आधार रहे हैं। इधर, खासतौर पर जब बात स्वास्थ्य की आती है तो तकनीक हमारे बुजुर्गों के लिए एक नई रस्म बन रही है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: क्या टेक्नोलॉजी और रिवाजों के मिलने से शादियों का ट्रेंड बदल रहा है?


