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29 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
इस सप्ताह की शुरुआत में मेरे साथ 9499 रु. की ठगी हो गई। मैं आश्वस्त था कि मेरे साथ कभी धोखाधड़ी नहीं हो सकती। इसलिए मैं बहुत बुरा महसूस कर रहा था। संयोग से घटना के दो मिनट बाद ही मेरी पत्नी घर में आईं। उन्होंने स्थिति को संभाला, मुझे किसी भी ऑनलाइन लेनदेन के लिए डेबिट कार्ड का उपयोग न करने की हिदायत दी, बैंक को फोन किया और कार्ड और खाते को ब्लॉक करवा दिया।
उन्होंने वो तमाम औपचारिकताएं पूरी करनी शुरू कर दीं, जो ठगी के शिकार किसी व्यक्ति को करनी होती हैं। जब मैंने ऐसे घोटालों की संख्या की जांच शुरू की, तो इससे निपटने वाली एजेंसियों ने मुझे बताया कि वास्तविक घटनाएं कई गुना अधिक हैं और बहुत से लोग डर के कारण धोखाधड़ी की रिपोर्ट नहीं करते हैं। मैंने पूछा कि पीड़ितों को डरने की क्या जरूरत है? उनके जवाब ने मुझे अहसास दिलाया कि खुद को हमदर्द बताने वाले उन लोगों के शब्दों की कितनी अहमियत है, जो नहीं जानते पीड़ित से कैसे बात करनी है।
पीड़ितों को उचित ही यह चिंता रहती है कि उन्हें ठगे जाने के लिए जज किया जाएगा। समाज उनसे इस तरह से सवाल करता है, जिससे उन्हें शर्म आती है या वे बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। हमारा समाज धोखाधड़ी के लिए उलटे पीड़ितों को दोषी ठहराने के लिए जाना जाता है। समाज का मानना है पीड़ित पर्याप्त समझदार नहीं था या उसने ध्यान नहीं दिया। लोग उत्सुक हो जाते हैं और जानना चाहते हैं कि धोखाधड़ी का कारण क्या था।
ऐसी स्थिति में कई लोग जो पहला सवाल पूछते हैं, वह कुछ इस तरह का होता है : “तुमने फोन उठाया ही क्यों?’ आप सोच रहे होंगे कि मेरी पत्नी का पहला सवाल क्या था? उन्होंने मेरी बेटी को वीडियो कॉल किया और फोन को मेरे सामने रखते हुए कहा, “अपने पिता से पूछो आज क्या हुआ?’ यह सवाल परिवार के भीतर बहुत साधारण-सा लगता है, लेकिन इसके पीछे एक जजमेंट छिपा है।
इससे ऐसा लगता है कि पीड़ित ने 9499 रुपयों के लिए परिवार को मुसीबत में डाल दिया। जबकि इसके बजाय पूछा सकता था कि “क्या तुम मुझे यह बताने में सहज महसूस करते हो कि क्या हुआ?’ ऐसे अवसरों पर पीड़ित से पूछा जाने वाला दूसरा सवाल है, “तुमने ठगों को कितने पैसे दे डाले?’ यह पीड़ित को और आहत करता है। इससे लगता है मानो पीड़ित ने ठगों को पैसे देते हुए कहा, “मेरे पैसे ले लो, मैं ठगा जाना चाहता हूं!’ जबकि पूछा जा सकता है, “तुमसे कितने पैसे चुरा लिए गए?’
मेरे मामले में तो पत्नी को दो मिनट बाद पता चल गया था, लेकिन कई मामलों में लोग अपने सबसे करीबी लोगों को भी यह बात नहीं बताते। इसलिए उनसे पूछा जाता है कि “मुझे तुरंत क्यों नहीं बताया?’ इसके बजाय यह कहा जा सकता है कि “मुझे खेद है, जो आपके साथ धोखाधड़ी हुई, लेकिन अगर आपने तुरंत ही यह बात बताई होती तो हमारे पास ठगों का सुराग लगाने की ज्यादा संभावना होती।’
पीड़ित हमेशा चाहते हैं कि आप समझें वे ठगी की वारदात में स्वेच्छा से भागीदार नहीं थे। विक्टिम उस सुबह यह सोचकर नहीं उठा था कि आज वह किसी अज्ञात घोटालेबाज को 9499 रु. भेजने जा रहा है। इसलिए पीड़ित से कहें, “मुझे दु:ख है कि आप एक अपराध का शिकार हुए, लेकिन क्या हम इस बारे में बात कर सकते हैं अगर आप सहज हैं तो?’
मैं आपसे अपनी फिक्र को दबाने के लिए नहीं, बल्कि अपने नैरेटिव को बदलने के लिए कह रहा हूं। हमें ऐसी किसी चीज के बारे में बात नहीं करनी चाहिए, जिसके बारे में पीड़ित को पहले से ही पता हो और इसके बजाय अपराध और अपराधी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके अलावा कोई यह भी कह सकता है : “मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूं?’
फंडा यह है कि जब आप वित्तीय ठगी के शिकार हुए किसी व्यक्ति से मिलें तो उसके प्रति उदारतापूर्ण रहें और उससे तफ्तीश करने के बजाय उसे तसल्ली देने वाले शब्द कहें। क्योंकि पीड़ित को भी पता है कि उससे क्या भूल हुई है। आपकी उदारता उन्हें गिल्ट का अनुभव नहीं कराएगी, जो कि एक समाज के रूप में हम हमेशा दूसरों को देना चाहते हैं।
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एन. रघुरामन का कॉलम: किसी के साथ ठगी होने पर क्या नहीं कहें?

