एन. रघुरामन का कॉलम: कनेक्शन और सेलिब्रेशन अपने पुराने तौर-तरीकों पर लौट रहे हैं Politics & News

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बचपन में हममें से ज्यादातर लोग पैरेंट्स के साथ ‘सत्संग’ में जाते थे। उनके बगल में बैठते थे। भले ही शायद हम न जानते हों कि भजनों के बोल क्या हैं और कैसे इन्हें गाया जाता है। कुछ लोगों ने शायद वो ऊर्जा तरंगें महसूस की होंगी और कुछ ने उन्हें अनदेखा किया होगा। हममें से अधिकतर के लिए वे यादें बस दबकर रह गईं, क्योंकि हम भागदौड़ भरी कॉर्पोरेट दुनिया में कदम रख चुके थे। सत्संग का दौर दशकों तक दबा हुआ रहा, भुलाया नहीं गया, लेकिन शांत हो गया। फिर संगीत ने नया अवतार लिया। हम हाई ऑक्टेन इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और चमकदार स्टूडियो प्रोडक्शन के दौर में आए, जहां क्लबों में लोग ग्लास हाथ मे लेकर तेज आवाज वाले ट्रैक्स पर नाचते थे, ताकि नशा उस रिदम को और बढ़ा दे। अब 2026 में आते हैं, जहां माहौल बदल चुका है। विकसित देशों में हम जेन-जी को ‘सॉबर क्यूरियस’ मूवमेंट सेलिब्रेट करते देख सकते हैं। युवा अब ड्रिंक्स को ना कह रहे हैं और मानसिक व शारीरिक सेहत को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि, भारत में यही पीढ़ी इस सादगी को एक कदम और आगे ले गई है। 2025 से बीते महज एक वर्ष में ही कोलकाता के दो लोगों ने एक सांस्कृतिक बदलाव की शुरुआत की है। ‘बैकस्टेज सिब्लिंग्स’ के नाम से विख्यात राघव और प्राची अग्रवाल ने सत्संग की प्राचीन परंपरा को स्टे​डियम कॉन्सर्ट जैसी सामुदायिक ऊर्जा से जोड़ कर आधुनिक संगीत को नया रूप दिया है। भाई-बहन की इस जोड़ी ने लिविंग रूम में होने वाले ‘भजन जैमिंग’ सेशंस को राष्ट्रीय परिदृश्य में ला दिया, जिसे सोशल मीडिया पर ‘भजन क्लबिंग’ कहते हैं। यह एक खास वैश्विक बदलाव की ओर इशारा करता है कि जेन-जी अब कनेक्शन और सेलिब्रेशन के कैसे तरीके तलाश रही है। देशभर में उनके शोज को युवा खुले मन से अपना रहे हैं। दक्षिण में बेंगलुरु से लेकर मध्य भारत के इंदौर और उत्तर के चंडीगढ़ तक वे खुद से भीतरी जुड़ाव कायम रखने की नई पहचान बन चुके हैं। पारंपरिक धार्मिक संगीत की औपचारिकताओं को कम करके और उसमें सूफी और बॉलीवुड धुनों की इन्फ्यूजिंग कर उन्होंने जेन-जी और मिलेनियल्स को ऐसा माहौल दिया है, जहां वे घर जैसा महसूस करते हैं। उनकी परफॉर्मेंस की असल खूबसूरती सादगी में है। ऊंचे मंचों वाले परंपरागत कॉन्सर्ट से अलग, वे दोनों अकसर फ्लोर पर बैठ कर प्रस्तुति देते हैं। उनके चारों ओर दर्शक बैठे होते हैं।
उनके सेशंस के कुछ स्पष्ट नियम हैं : न शराब और न खाना। इससे ऊर्जा शुद्ध और पूरी तरह संगीत पर केंद्रित रहती है। वे इंटरेक्टिव सहभागिता को प्रोत्साहित करते हैं, जहां दर्शक सुनते ही नहीं बल्कि साथ में गाते और जपते हैं। तेज आवाज वाली वेस्टर्न बीट्स की जगह सोलफुल, एकॉस्टिक धुनों ने ले ली है, जो ध्यान जैसी अवस्था पैदा करती हैं। वे बिना बाधाओं वाला खुला और गर्मजोशी का माहौल बनाते हैं, जहां उद्देश्य म​हज गाना और संगीत को महसूस करना होता है। वह हर किसी को भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करते हैं, फिर चाहे वह पारंपरिक भजन, कोई बॉलीवुड क्लासिक या कविता हो। 50 लोगों के साथ उनके लिविंग रूम में शुरू हुई शौकिया भजन जैमिंग धीरे-धीरे ऐसे मूवमेंट में बदल गई, जिसने मनोरंजन में गहराई तलाश रही एक पूरी पीढ़ी को जोड़ लिया। राघव और प्राची की सफलता की वजह उनकी परवरिश है। वे अकसर अपने पिता के साथ पारंपरिक भक्ति सभाओं में जाते थे। इसे पारिवारिक आस्था कहें या परंपरा, जो उनके तन-मन में गहराई से पैठ गई। इसी कारण से वे अपने नजरिए से जेन-जी के लिए एक नया कनेक्शन बना सके, जबकि एक ऊंची तनख्वाह वाली कॉर्पोरेट जॉब करते हुए वे पहले ही समाज की नजरों में तो सफल ही थे। फंडा यह है कि बचपन में एक ऐसा अच्छा बीज बोइए, जिस पर आपको भरोसा हो कि वह गहरी जड़ें पकड़ेगा, और फिर भूल जाइए। वही बीज एक दिन नए रूप में फल देगा और पूरी नई पीढ़ी के लिए खुशी और उद्देश्य लेकर आएगा।

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एन. रघुरामन का कॉलम: कनेक्शन और सेलिब्रेशन अपने पुराने तौर-तरीकों पर लौट रहे हैं