एन. रघुरामन का कॉलम: ऑल-इन-वन प्रजाति यानी स्त्रियों से मैंने दो शानदार सबक सीखे हैं! Politics & News

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55 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

1. बाहर तापमान एक अंक में हो या मूसलधार बारिश हो रही हो- उनका एक नियम अटल था : सुबह 5 बजे से बहुत पहले जब अलार्म घड़ी बज उठे तो उसके बाद कभी अलार्म (स्नूज) बटन नहीं दबाना। वे मुंह-अंधेरे में उठतीं और सबसे पहले अपना बिस्तर ठीक करतीं। लेकिन उनकी गति को आगे बढ़ाने वाली चीज होती- फिल्टर कॉफी, जिसकी महक से घर के बाकी लोग, खासकर पिता भी जाग जाते। वही उनका प्रोटीन शेक था।

आधुनिक माताओं की तरह वे अपना ‘वर्कआउट गियर’ पहनतीं- मेरा मतलब है, वे साड़ी को टखनों से ऊपर उठाकर कमर में खोंस लेतीं और अपनी ‘जिम’ की ओर बढ़ जातीं। जी हां, 1960 और 70 के दशक में उनकी जिम की पहली एक्सरसाइज का मतलब था बरामदे में झाडू लगाना और रंगोली बनाना, जिससे घर उजला लगता। इसके बाद उनकी ‘सिट-डाउन एक्सरसाइज’ शुरू होतीं- सब्जियां काटना, चावल साफ करना और पूरे परिवार के लिए नाश्ता तैयार करना।

वे इस सबको अपने ‘इंस्टाग्राम’ में दर्ज करती थीं- यानी अपनी मां को लिखे जाने वाले 15 पैसे के इनलैंड लेटर में। मैंने उन्हें तभी से ‘फॉलो’ करना शुरू कर दिया था, जब वे अपनी 20 की दहाई में थीं। मैं उनके 6.2 मिलियन फॉलोअर्स में से एक था। आपने सही पढ़ा। यों तो उनके छह फॉलोअर्स थे- माता-पिता, चार वयस्क भाई-बहन, दो बच्चे- यानी मैं और मेरी बहन। कुल 6.2 लोग, जो उन्हें सराहते थे। मैंने ‘मिलियन’ इसलिए कहा, क्योंकि इस दुनिया का हर व्यक्ति उनके लिए लाखों के बराबर था।

यहीं से मुझे अपना यह पहला सबक मिला कि अच्छे लीडर्स सुबह जल्दी क्यों उठते हैं। यह सिर्फ उत्पादकता, अनुशासन या सफलता के लिए नहीं है- बल्कि अपने दिन पर नियंत्रण पाने के लिए है। वे अलार्म बजने पर ‘स्नूज’ नहीं दबाते, उठते ही फोन के नोटिफिकेशंस नहीं चेक करते और उनका मन कभी भी थका हुआ नहीं होता। वे भीतर की शांति के लिए सन्नाटा चुनते हैं; अपने संकल्प को मजबूत करने के लिए प्रार्थना करते हैं; और सुबह के शुरुआती घंटों में बेहतर और अलग गुणवत्ता का काम करने के लिए अपने शरीर को सक्रिय रखते हैं।

2. आपमें से कई लोगों ने बगीचे में पौधों को पानी देते समय कभी न कभी वह तीखी चहचहाहट सुनी होगी। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मैंने झुककर देखा तो पाया कि वहां नवजात चूजों का एक छोटा-सा झुंड था। वे कांप रहे थे और उनकी आंखें भी खुली नहीं थीं। तीन नन्हे बच्चे, एक-दूसरे से सटे हुए, आसपास की दुनिया से अनजान। मैं कई हफ्तों तक उन्हें देखता रहा।

उनकी मां नियमित अंतराल पर आती। वह उनसे बहुत दूर नहीं जाती थी, ताकि उन पर नजर रख सके। जब कोई बड़ा पक्षी या संदिग्ध जानवर आसपास दिखता, तो वह जैसे तीखी आवाज में मुझे पुकारती और मैं दौड़कर उन्हें भगाने पहुंच जाता। मैंने पेड़ के पास खाना रखना भी शुरू कर दिया। वह खा तो लेती, लेकिन अपने बच्चों को खिलाने के लिए खुद बाहर जाती और कीड़े पकड़कर लाती। शायद वही उनका ‘प्रोटीन शेक’ था।

एक दिन उसने उन्हें घोंसले से कूदने के लिए प्रेरित किया। एक बच्चा कूदा और थोड़ा-सा उड़ने के बाद सुरक्षित उतर गया। दूसरा थोड़ा डगमगाया। तीसरा सबसे देर तक घोंसले में ठहरा रहा। मां जैसे चुपचाप उसे कह रही थी- चलो, तुम कर सकते हो। और फिर वे सब उड़ गए।

यही मेरा दूसरा सबक था। उन्हें देखते हुए मुझे एहसास हुआ कि हम अकसर मानते हैं जीवन पूरी तरह योजना और नियंत्रण पर टिका होता है। हम सूचियां बनाते हैं, बजट तैयार करते हैं, लेकिन जो लोग उन चिड़ियों की तरह अनजानी दुनिया में छलांग लगाने का साहस करते हैं, वे सफलता पाते हैं।

किसी अनजान व्यक्ति से विवाह करना, उसके साथ एक नए शहर में जाना, एक रिश्ता शुरू करना, बच्चों को जन्म देना और फिर अंततः पति को सपोर्ट करने के लिए खुद नौकरी करना- इनमें से हर क्षण वैसा ही है जैसे माता-पिता के सुरक्षित घोंसले से निकलकर किसी अनजानी जमीन पर कूदना। जीवन इस बात से कम तय होता है कि हम किसे पकड़े रहते हैं, और इस बात से ज्यादा कि हम किस जोखिम को स्वीकारने और अज्ञात की ओर छलांग लगाने का साहस दिखाते हैं।

फंडा यह है कि तमाम प्रजातियों की स्त्रियां और कुछ नहीं, बस अपने आपमें एक ऑल-इन-वन व्यक्तित्व होती हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि हम उनके होने का उत्सव मनाते हैं। महिला दिवस की शुभकामनाएं।

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