एन. रघुरामन का कॉलम: ऐसा पछतावा ना हो कि ‘एक बार पूछ लेता तो अच्छा होता’ Politics & News

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कैंसर पीड़ित एक युवक ने घर और अस्पताल में कई महीने गुजारने के बाद एक दिन बाहर निकलने का फैसला किया। वह एक म्यूजिक स्टोर पर सीडी खरीदने रुका और वहां मौजूद सेल्स गर्ल उसे अच्छी लग गई। जैसे ही वह अंदर गया, उसे पहली ही नजर में प्यार हो गया। वह काउंटर तक गया तो सेल्स गर्ल ने मुस्कराकर पूछा- ‘क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकती हूं?’ लंबे समय से गंभीर-से चेहरे देख रहे उस युवा के लिए यह अब तक की सबसे खूबसूरत मुस्कान थी। वह बोला- ‘उम्म… मैं एक सीडी लेना चाहता हूं।’ उसे जो पहली सीडी दिखी, उठा ली और पैसे दे दिए। लड़की मुस्कराते हुए बोली, ‘क्या मैं इसे गिफ्ट रैप कर दूं?’ लड़के ने हां बोला और वो उसे रैप करने पीछे के रूम में चली गई। लड़का रैप्ड सीडी लेकर घर चला गया। तब से अगले कुछ दिन तक वह नियमित उसी म्यूजिक स्टोर पर जाता और हर दिन एक सीडी खरीदता। रोजाना लड़की उन्हें गिफ्ट रैप करती रही और लड़का वो सीडी बिना खोले ही अपनी अलमारी में रखता रहा। लड़का बेहद शर्मीला था। उसने लाख कोशिश की, लेकिन लड़की से आउटिंग पर चलने के लिए पूछने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाया। एक दिन उसके दोस्त ने उसे हौसला दिया। अगले दिन वह पक्का मन बनाकर स्टोर पहुंचा। हमेशा की तरह एक सीडी खरीदी और जब लड़की किसी दूसरे ग्राहक को अटैंड कर रही थी तो अपना फोन नंबर वहां छोड़कर चला गया। अगले दो दिन वह स्टोर नहीं गया तो लड़की ने उसे फोन किया। मां ने फोन उठाया और सोचने लगीं कि ये कौन हो सकता है। ये वही म्यूजिक स्टोर वाली लड़की थी। उसने बेटे से बात कराने को कहा तो मां रो पड़ीं। लड़की ने पूछा, क्या हुआ? मां बोलीं, ‘तुम्हें नहीं पता? वह तो कल ही गुजर गया।’ फोन पर लंबी खामोशी छा गई। उसी दोपहर मां ने उसकी अलमारी खोली और देखकर हैरान रह गईं कि वहां गिफ्ट-पेपर में लिपटीं बहुत सारी सीडी रखी थीं। चूंकि वहां बहुत-सी सीडी थीं, तो मां को उत्सुकता हुई और उन्होंने हाल ही में लाई गई एक सीडी खोल ली। पैकेट फाड़ते ही उन्हें एक पर्ची दिखी, जिस पर लिखा था- ‘हाय, तुम बहुत क्यूट हो। मैं तुमसे मिलना चाहूंगी। कभी बाहर चलें? -सोफी।’ यह देख कर मां फफक पड़ीं। गुरुवार की रात एक बड़ी गलती करने के बाद मुझे यह कहानी याद आई। मैं मुंबई जाने वाली ट्रेन की जगह पुणे जा रही ट्रेन में चढ़ गया था। दोनों ट्रेनें अमरावती से ही चलती हैं। गलत ट्रेन में चढ़ने के बाद कुछ सोच पाता, उससे पहले ही मैंने देखा कि दो और लोग भी यही गलती कर बैठे थे। अब वो कभी रेलवे अनाउंसमेंट सिस्टम को कोस रहे थे, तो कभी चेन खींचने की धमकी दे रहे थे। जब वे टीसी से झगड़ रहे थे तो मुम्बई जाने वाली ट्रेन दूसरे ट्रैक पर हमें ओवरटेक कर गई, क्योंकि वो पुणे की ट्रेन से ज्यादा फास्ट थी। मैंने हेड टीसी के बारे में पता करने के लिए बेडरोल सुपरवाइजर से मदद लेने का निर्णय किया और गलती के लिए उनसे माफी मांगी। हेड टीसी के लिए मैं उन यात्रियों से बेहतर था, जो कड़वाहट भरी तेज आवाज में शिकायत कर रहे थे। उन्होंने तत्काल पीछे आ रही ट्रेन के हेड से संपर्क किया और मदद का इंतजाम कर दिया। हम सब मनमाड स्टेशन पर उतर गए, लेकिन सीट मुझ अकेले को ही मिल पाई। वे दोनों फिर शिकायत करने लगे कि मुझे सीट क्यों मिली और उन्हें क्यों नहीं। तब टीसी ने कहा, ‘आप पहले पूछ लेते तो मैं आपको देता…’ फंडा यह है कि जिंदगी में कोई विचित्र-सी स्थिति आए तो तत्काल पूछ लेना बेहतर है, बजाय इसके कि हम बाद में पछतावा करें- ‘एक बार पूछ लेता तो अच्छा होता।’

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एन. रघुरामन का कॉलम: ऐसा पछतावा ना हो कि ‘एक बार पूछ लेता तो अच्छा होता’