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परीक्षाएं हों या गर्मियों की छुट्टियां, स्कूल के दिन हों या वीकेंड, चाहे बाहर बारिश हो रही हो या अचानक बिजली चली जाए, लेकिन शाम 7.30 बजे हमारा डिनर टाइम तय था। हम उस फैमिली गैदरिंग में न आने का कोई बहाना नहीं बना सकते थे। नियम सिर्फ दो मौकों पर टूटता था- जब किसी को तेज बुखार हो या देश युद्ध लड़ रहा हो। जैसे 1971 का बांग्लादेश युद्ध, जब स्ट्रीट लाइट्स तक बंद कर दी जाती और साइकिल के डायनेमो आधे काले पोत दिए जाते थे। हम सब रसोई में बैठते थे, जहां न डाइनिंग टेबल थी, न गैस स्टोव वाला किचन प्लेटफॉर्म। ये सुविधाएं मेरी बहन के जन्म के बाद घर में आईं। डाइनिंग टेबल पर भी हम दोनों बच्चे एक दिशा में मुंह करके बैठते और बाकी दो दिशाओं में माता-पिता बैठते थे। दक्षिण दिशा खाली रहती थी। पैरेंट्स की एक धारणा के चलते हमारे घर में दक्षिण दिशा में मुंह करके भोजन से बचा जाता था। यह धारणा वास्तु शास्त्र और ऊर्जा से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं का मिला-जुला रूप थी। डिनर के दौरान यह मुझे मेरी मां से मिला पहला बहस योग्य सबक था, जो आर्किटेक्चर, एनर्जी, मान्यताओं जैसे विषयों से जुड़ा था। और इसीलिए आज मैं आपको एक सलाह देना चाहता हूं। दिन का एक खाना साथ बैठकर खाइए और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताइए। समय के साथ आप अपने बच्चों में फर्क देखेंगे। जब आप पैरेंट्स बनते हैं तो आपको उपहार ही नहीं, पर्याप्त सलाह भी मिलती हैं। लेकिन मेरी यह सलाह गारंटी से आपके बच्चों को बेहतरीन इंसान बनाएगी। यहां तक कि मेरी बहन के जन्म के समय जब मेरी मां अस्पताल गई थीं, तब भी हम पिता-पुत्र साधारण-से खाने के लिए साथ बैठे थे। हम दोनों की बातचीत हमेशा लंबी होती थी। चाहे 10 मिनट हों या आधा घंटा, साथ भोजन करने का नियम नॉन निगोशिएबल था। बेशक, इसका फायदा भी था। बचपन की ये बातें मुझे तब याद आईं, जब हाल ही में मैंने “फैमिली डिनर प्रोजेक्ट’ (एफडीपी) की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. एमी फिशेल के बारे में पढ़ा। वे कहती हैं कि नियमित एफडीपी का संबंध डिप्रेशन, एंग्जायटी, नशे या तंबाकू की लत, ईटिंग डिसऑर्डर, मोटापा और इन दिनों विकसित देशों में हो रही टीन-एज प्रेग्नेंसी की दर को कम करने से जुड़ा है। इससे रेजिलिएंसी और आत्मसम्मान में बढ़ोतरी होती है। कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ बेहतर होती है। प्री-स्कूल बच्चों में शब्दकोश बढ़ता है और बड़े बच्चों का अकादमिक प्रदर्शन सुधरता है। उनके सर्वे में एकसाथ भोजन करने वाले 80% परिवार यह परंपरा जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि किशोरों को लगता है कि उस समय वे पैरेंट्स से खुलकर बात कर सकते हैं। डिनर टेबल शिष्टाचार, धैर्य सीखने का ट्रेनिंग ग्राउंड और डिजिटल डिवाइसेस के डिस्ट्रैक्शन के बगैर साथ बैठने का दुर्लभ मौका होता है। परिजनों को धीमे खाने वालों का इंतजार करना होता है और खाना पकाने वाली मां को रोज धन्यवाद देना होता है। उन्हें रोज नए स्वाद जानने को मिलते हैं। यह गहन चर्चा में जुड़ने और बड़ों की बातचीत सुनने का सबसे सही समय होता है। बच्चे सहानुभूति सीखते हैं, समसामयिक घटनाओं के बारे में जानते हैं और धीरे-धीरे अपनी राय रखने लगते हैं। फिल्मों, किताबों, बिजनेस और राजनीति पर चर्चा होती है। मैं सभी यंग पैरेंट्स से जोर देकर कहूंगा कि वे अमांडा रिपली की किताब ‘द स्मार्टेस्ट किड्स इन द वर्ल्ड’ जरूर पढ़ें। इसमें टेबल पर बातचीत शुरू करने के शानदार तरीके बताए गए हैं। फंडा यह है कि परिवार के तौर पर साथ भोजन करना किसी प्रोजेक्ट से कम नहीं। इसीलिए इसे ‘एफडीपी’ कहा गया है। प्रत्येक डिनर पर इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए हमारी मां जो मेहनत करती हैं, उसकी खूब तारीफ होनी चाहिए, क्योंकि वे भावी पीढ़ी को बेहतर इंसान बनाने का काम कर रही होती हैं।
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एन. रघुरामन का कॉलम: ‘एफडीपी’ अपनाने से बच्चों की सफलता पक्की है


