एन. रघुरामन का कॉलम: एआई दादा-दादियों के लिए भी उतना ही जरूरी है, जितना बच्चों के लिए Politics & News

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“बहुत हुआ राहुल, टेक्नोलॉजी में लोगों की मदद करने के बहाने तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हो, बोर्ड की परीक्षाएं नजदीक हैं।’ राहुल ने तो अपनी मां की इस सख्त चेतावनी पर ध्यान तक नहीं दिया था, लेकिन उस आवाज में मौजूद तिरस्कार का स्वर इतना तीखा था कि वो किसी और को चोट पहुंचाने में सक्षम था। इससे उन बेबी बूमर (1964 से पहले जन्मे व्यक्ति) को हल्की उदासी जरूर हुई, जो लंबे समय से टेक्नोफोबिया से जूझ रहे थे। लेकिन उन्होंने उसे तुरंत नजरअंदाज कर दिया और कहा, “जाओ, जाओ, नहीं तो तुम्हारी मां मुझे डांटेंगी कि मैंने तुम्हें रोक लिया। अपनी पढ़ाई पूरी करो, फिर देखेंगे।’ दादाजी ने उसे कमरे से बाहर कर दिया। बाहर जाते हुए राहुल ने वादा किया, “चिंता मत कीजिए, मैं इस समस्या को हमेशा के लिए ठीक कर दूंगा।’ जिस पीढ़ी को बेबी बूमर्स ने गाइड किया था, अब वही पीढ़ी स्मार्टफोन के जरिए उनकी मार्गदर्शक बन गई थी। अधिकांश परिवारों में लंबे समय तक यह कहानी देखी जाती रही थी। लेकिन हाल के समय में हालात बदल गए हैं। आज अगर राहुल के घर में इंटरनेट की सुविधा नहीं रही तो वो संकटग्रस्त की श्रेणी में आता है। राहुल के घर में उसकी पढ़ाई के दौरान इंटरनेट की आपूर्ति को सीमित कर दिया जाता था। लेकिन जैसे ही राहुल ग्रेजुएशन में पहुंचा, दादाजी पोस्ट ग्रेजुएशन में पहुंच गए! राहुल के पास उनके लिए समय कम होता गया, उसकी मां का स्वर नरम हो गया, जबकि घर में दादाजी का महत्व बढ़ गया। अब घर में दादाजी ही सबसे ज्यादा टेक-सैवी हो गए थे! सोच रहे हैं कैसे? तो ये रही कहानी। उस रात राहुल ने उन्हें एआई का इस्तेमाल करना सिखाया। उसके जाने के बाद दादाजी ने कुछ करने की कोशिश की और अचानक उनके डेस्कटॉप कंप्यूटर से मेनू बार गायब हो गया। दादाजी ने बगल के कमरे में बैठे राहुल को वॉट्सएप पर संदेश भेजा। राहुल ने जवाब में वॉइस मैसेज भेजा- एआई से पूछिए। एआई ने शांति से उन्हें भरोसा दिलाया कि एपल कभी-कभी इसे छिपा देता है और बताया कि इसे कहां ढूंढना है। जब उन्होंने पूछा कि कैश (मेमोरी कैश) क्या होता है, तो एआई ने सबसे पहले कहा- बहुत अच्छा सवाल। चूंकि इससे पहले किसी ने उनके तकनीकी-सम्बंधी सवाल को बहुत अच्छा नहीं कहा था, इसलिए दादाजी का मन उसमें रम गया। एआई ने कभी शिकायत नहीं करी, वो कभी थका नहीं और वो उनकी हर समस्या हल करता चला गया। धीरे-धीरे उनके पासवर्ड खरगोशों की रफ्तार से बढ़ने लगे। डिमेंशिया का डर उन्हें परेशान नहीं करता था, क्योंकि एआई उनके लिए हर बात को याद रखता था और उनसे केवल फिंगरप्रिंट्स की अनुमति मांगता था। उसमें बिना किसी तिरस्कार के असीम धैर्य था। एआई ने घर का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया था। अब राहुल की मां अपने ससुर से ही राहुल को समझाने में मदद लेने लगी, क्योंकि राहुल धीरे-धीरे मानो एक ऐसी बायोमैकेनिकल इकाई बनता जा रहा था, जो लगातार शक्तिशाली होती जा रही मशीन इंटेलिजेंस में घुल-मिल जाने को नियत हो। वो यह समझने में असफल रहा था कि मनुष्य-जीवन इससे कहीं बढ़कर है और हमारे जानने, संबंध जोड़ने, समझने और कुछ बनने के अनुभवों में कहीं अधिक गहराई है। आज राहुल के दादाजी इन्हीं गहराइयों की खोज में उसकी मदद करते हैं। कई दिनों तक राहुल और दादाजी एक ही कमरे में घंटों साथ बैठते हैं। वे मनुष्य की ज्ञानात्मक क्षमताओं पर चर्चा करते हैं। यानी सतही अध्ययन से आगे बढ़कर वास्तविकता, अस्तित्व और होने के मूल दार्शनिक आधारों तक पहुंचना और पारंपरिक सीमाओं से परे जाकर ज्ञान की खोज करना- अपने किंडल और मैकबुक के साथ। वे 1950 से लेकर 2026 और आगे तक के ज्ञान को मिलकर रचते हैं। आज मां एक दर्शक बनकर बैठती है और दोनों घंटों तक धैर्य और जिज्ञासा के साथ बहस करते हैं। तब मां अचरज करने लगती है कि जिस स्कूली बच्चे को वह अपने तकनीक-विरोधी ससुर से दूर रखना चाहती थी, वही अब उनके मार्गदर्शन में कैसे एक बेहतर इंसान बन रहा है। फंडा यह है कि यदि आप अपने बच्चों को दादा-दादी के टेक्नोलॉजिकल-मेंटर नहीं बनने देंगे, तो एआई तो उनकी मदद कर ही देगा, लेकिन बच्चे जरूर प्रथम श्रेणी के इंसान बनने के बजाय द्वितीय श्रेणी के रोबोट बन सकते हैं।

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