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अस्पताल में भर्ती मेरे एक परिजन को लेकर बुधवार को मैंने डॉक्टर से पूछा कि वे कब डिस्चार्ज हो सकते हैं? डॉक्टर ने कहा कि ‘इतनी जल्दबाजी क्यों?’ मैंने कहा, जल्दबाजी नहीं लेकिन गुरुवार और शुक्रवार को मुझे अपने अंकल के 80वें जन्मदिन में शामिल होना है। उन्होंने ऐसे देखा, जैसे कोई शिक्षित व्यक्ति किसी के खराब स्वास्थ्य से ज्यादा सेलिब्रेशन को प्राथमिकता दे रहा हो। तब मैंने उन्हें बताया कि क्यों हम 60, 70, 80, 90 और 100 साल की उम्र का जश्न इतनी धूमधाम से मनाते हैं।
यदि आपके मन में सवाल है कि ये संख्याएं आध्यात्मिक हैं या सिर्फ सांस्कृतिक परंपरा, तो इसका जवाब महाभारत की राजा ययाति की कहानी में है। ययाति ने जीवन पूर्ण रूप से जिया- सत्ता, सुख, सफलता और सब कुछ। लेकिन अचानक आए बुढ़ापे ने उनको झकझोर दिया। गहरे आत्मचिंतन के बाद उन्हें पता चला कि ‘सुख की तो सीमा होती है, लेकिन इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं।’ इस एक समझ ने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने बुढ़ापे को स्वीकार किया और बताया कि जीवन में पांच आंतरिक टर्निंग पॉइंट्स होते हैं- जो उम्र पर नहीं, समझ पर आधारित होते हैं। ये टर्निंग पॉइंट्स 60, 70, 80, 90 और 100 वर्ष उम्र की भारतीय परंपराओं से जुड़े हैं। इनकी व्याख्या कुछ इस प्रकार है। 60 पर षष्टिपूर्ति : 60 की उम्र में कुछ बदलता है- शरीर में नहीं, प्राथमिकताओं में। यह सवाल गायब होने लगता है कि ‘मैं और कितना पा सकता हूं?’ इसके स्थान पर आता है कि ‘सच में अब क्या मायने रखता है?’ आपका मन संचय से समझ की ओर बढ़ता है। आत्ममंथन शुरू होता है। अब शोर, तारीफ और बाहरी मान्यता की जरूरत नहीं रह जाती। तलाश होती है स्पष्टता की। यह कमजोरी नहीं, बल्कि महत्वाकांक्षा के साथ आई परिपक्वता है। 70 पर भीमरथ शांति : खुद को सही साबित करने के बजाय शांति अधिक ताकतवर लगती है। आप तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते। बहसें आकर्षक नहीं लगतीं। बहस जीतने से ज्यादा रिश्तों को सहेजना अहम हो जाता है। लगता है कि सही होने से ज्यादा मूल्यवान शांत रहना है। 80 पर शताभिषेकम : महज आपकी मौजूदगी ही सुकून देने लगती है। 80 की उम्र में लोग सलाह लेने नहीं आते। वे कुछ गहरा तलाशते हैं- यह भरोसा कि जीवन जिया और समझा जा सकता है। इस उम्र में आपकी उपस्थिति ही आशीर्वाद बन जाती है। शब्द जरूरी नहीं रहते। आपका होना ही कहता है कि सब कुशलता से है। इसीलिए 80 की उम्र पवित्र मानी गई है। 90 पर नवति : यहां कुछ दुर्लभ घटित होता है। अहंकार चला जाता है। आपको दूसरों को सुधारने की इच्छा नहीं होती। आप अपनी राय पर अड़े नहीं रहते। चीजें व्यक्तिगत नहीं ली जातीं। सहज रूप से आपको ठेस नहीं पहुंचती। ऐसा कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि जीवन आपको बहुत कुछ दिखा चुका होता है। छोटी-मोटी बातों पर आप ऊर्जा खर्च नहीं करते। एक शांत-सी स्थिरता आ जाती है। यह विनम्रता ही सच्ची आध्यात्मिकता है। 100 पर शतमानम : जीवन व्यक्तिगत कहानियों से आगे बढ़ जाता है। 100 की उम्र तक पहुंचना महज वर्षों की गिनती नहीं, बल्कि वह अवस्था है, जहां व्यापक परिदृश्य दिखने लगता है। आपको समझ आता है कि जिन चिंताओं को ढोते रहे, वे बेवजह थीं। जो प्रेम आपने दिया, सच में वही मायने रखता था। जीवन को हमेशा एक रहस्यमयी, दयालुताभरी शक्ति चला रही थी। 100 की उम्र में कोई एक व्यक्ति कम और मौजूदगी अधिक हो जाता है। इन पांचों अवस्थाओं का सार हमारे ऋषियों और पूर्वजों के जीवन में देखा जा सकता है। उन्होंने उम्र नहीं, बल्कि उम्र के साथ आने वाले बदलाव का जश्न मनाया। 60 पर प्राथमिकताएं बदलती हैं। 70 पर शांति ताकत बन जाती है। 80 पर मौजूदगी सुकून देती है। 90 पर अहंकार चला जाता है। 100 पर जीवन पूर्णता तक पहुंचता है। इसी कारण जब हम इन उम्र के बुजुर्गों को देखते हैं तो उनके पैर छूकर कहते हैं हमें आशीर्वाद दीजिए, हमें भी बेहतर जीवन के लिए वही गुण चाहिए। आपको ऐसे बुजुर्ग नजर आएं तो जरूर उनका आशीर्वाद लें। फंडा यह है कि उम्र कोई गिरावट नहीं है, बल्कि एक फिल्टरेशन प्रोसेस है- जिसमें समझदारी, सौम्यता और गरिमा ही रह जाती है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: उम्रदराज होने का अर्थ है जीवन अधिक पवित्र, समझदारी और सौम्यता भरा हो

