एन. रघुरामन का कॉलम: इस ‘समर चैलेंज’ को जीतकर बनें विजेता Politics & News

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55 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

गर्मी के इस सीजन में सिर्फ तापमान नहीं बढ़ रहा, बल्कि घर के खर्चों में भी उछाल आ रहा है। जिन लोगों ने नए एयर कंडीशनर या स्टेबलाइजर्स की ‘पैनिक बाइंग’ से खुद को बचा लिया था, अचानक उन्हें नए खर्च ने घेर लिया है। इंडक्शन चूल्हा और उसके अनुकूल बर्तनों की अचानक खरीदारी बढ़ गई है।

गैस सिलेंडर की कमी की वजह से मजबूरी में लोगों को बिजली से खाना पकाने के विकल्प अपनाने पड़े। इसने महीने के बजट को शुरू में ही बिगाड़ दिया है। इससे बिजली का बिल तो बढ़ ही रहा है, असली मार उन छोटे दैनिक खर्चों से पड़ती है जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

इन तपिश वाले दिनों में कोल्ड ड्रिंक्स, जूस और ग्लूकोज का इस्तेमाल हमारे घरों में बढ़ जाता है। इस बीच आम जैसे फलों के ऊंचे दाम भी बजट बिगाड़ रहे हैं। दोपहर की लू से बचने के लिए एक साधारण ऑटो-रिक्शा की जगह एसी कैब का चुनाव भी हमारी जेब का बोझ बढ़ा रहा है। बढ़ती गर्मी में कॉटन कपड़े अब लग्जरी नहीं, बल्कि जरूरत बन गए हैं, जो बजट का एक बड़ा हिस्सा मांगते हैं।

इस बार मौसमी महंगाई के साथ-साथ आर्थिक माहौल भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। खाने की चीजें, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और एफएमसीजी गुड्स की बढ़ती कीमतें आम आदमी को पिछले साल के मुकाबले ‘गरीब’ महसूस करा रही हैं। 5-7% की अनुमानित महंगाई दर बजट बनाने के निर्णयों पर भारी पड़ेगी।

इससे आज के खर्च और कल की बचत के बीच एक कठिन चुनाव करना होगा। ऊपर से पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव आग में घी का काम कर रहा है। यदि यह संघर्ष तीन महीने से अधिक खिंचता है, तो ईंधन और सप्लाई चेन पर पड़ने वाला असर हर घर की रसोई तक पहुंचेगा।

हालांकि मंदी का तत्काल कोई खतरा नहीं है, लेकिन बाजार की सुस्ती से इनकार नहीं किया जा सकता। गर्मी से बचने के लिए कई लोग सोचते हैं कि वे मॉल जाकर ‘मुफ्त’ एसी का आनंद लेकर बिजली बचा रहे हैं।

लेकिन यह रणनीति अक्सर उल्टा वार करती है। जैसे ही आप मॉल में घुसते हैं, बिना सोचे-समझे खरीदारी का मनोविज्ञान हावी हो जाता है। ‘एंड ऑफ सीजन सेल’ और महंगे आइसक्रीम संडे के चक्कर में, वह ‘मुफ्त’ एसी घर के पूरे दिन के बिजली बिल से भी महंगा पड़ता है।

मैनेजमेंट टिप: डगमगाते बाजार और अप्रत्याशित महंगाई के बीच हमारी जेब ढीली होना तय है। अब वह समय आ गया है जब हमें ‘छाछ भी फूंक-फूंक कर’ पीनी चाहिए। यानी हर छोटे खर्च को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।

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