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- N. Raghuraman’s Column Modern Couples Are Dividing Household Chores By Playing Cards!
11 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
वह एक फार्मा कंपनी में रिसर्च हेड है और उसका जिम्मा नई दवाओं पर काम करने का है। वह एकाग्र होकर काम करने ही वाली थी कि उसके दिमाग में आया और चिंता भी हुई कि अपनी सात महीने की बच्ची के लिए वह पर्याप्त डाइपर रखकर आई है या नहीं, उसे अपने रिश्तेदार को बता देना चाहिए कि गैराज की शेल्फ पर से वह कुछ डाइपर उठा लें।
बहरहाल उसने इन विचारों को नजरअंदाज किया और फिर से काम पर ध्यान लगाने की कोशिश करने लगी। अचानक उसके मोबाइल पर एक वॉकर का विज्ञापन दिखा, जो कि 50% सेल का था। फिर से उसका दिमाग इस ओर चला गया कि वह अगर इसे अभी से ले लेती है, तो कितना पैसा बचा लेगी, हालांकि इसकी जरूरत कुछ महीने बाद ही पड़ने वाली थी।
उसने तय किया कि इस संबंध में पति से डिनर पर बात करेगी और फिर से काम पर ध्यान देने की कोशिश की। चंद मिनटों बाद 3 बजे बेबी मिल्क का अलार्म बजने लगा, जिससे फिर उसका ध्यान टूट गया। उसके मन में असमंजस था कि सास से पूछूं या नहीं? उसे चिंता थी कि उसकी सास क्या सोचेगी? पर साथ ही साथ उसके अंदर की मां यह जानने के लिए उत्सुक थी कि बच्चे ने समय पर दूध पिया या नहीं?
ऐसे में वह ना तो काम पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पा रही थी, ना ही परिवार के साथ पूरी तरह मौजूद थी। लगभग आठ महीने बाद, पिछले हफ्ते ही काम पर लौटी युवा मां आने के बाद से ही काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही थी।
जबकि वह उन कुछ भाग्यशाली लोगों में से एक है, जिसके पास इन सभी महीनों के लिए परिवार से कोई व्यक्ति बच्चे की देखभाल के लिए विशेष रूप से भारत से आया था, क्योंकि अमेरिका में बच्चे का पालन-पोषण करना कोई आसान काम नहीं है, खासकर जब पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों।
फिर भी पिछले एक हफ्ते से, वह ‘कॉग्निटिव लेबर’ में थी- ये अवैतनिक काम है जहां एक व्यक्ति को जरूरतों का अनुमान लगाना पड़ता है, उन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकल्पों की पहचान करनी होती है, निर्णय लेना पड़ता है और प्रगति की निगरानी करनी होती है।
चूंकि उनके पति काम से देर से लौटते हैं, ऐसे में सारा बोझ उसे ही महसूस हो रहा था, वो खीझ रही थी, पति पर चिल्ला रही थी। इससे वह भी धीरे-धीरे दूर-सा हो रहा था।
पिछले साल अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान मैंने एक भारतीय दंपति को देखा था, जो ऐसे हालात से जूझ रहे थे। फिर उन्हें इस संबंध में मदद मिली कि सभी ‘कॉग्निटिव लेबर’ की जिम्मेदारी कौन लेगा। वे दोनों साथ में बैठे और ‘कॉग्निटिव लेबर’ के तहत आने वाले सारे काम लिख लिए।
हालांकि इसकी लिस्ट बनाना आसान नहीं था। इसमें कुछ समय से लेकर कुछ दिन तक लग सकते हैं। ग्रॉसरी खरीदने से लेकर ऑनलाइन टिकट बुक करने, बच्चे के टीकाकरण के लिए अपॉइंटमेंट लेने, दोनों में से किसी के बीमार होने पर डॉक्टर की अपॉइंटमेंट जैसे काम से लेकर साधारण से रोजमर्रा के काम जैसे गाड़ी में पेट्रोल भराने और मासिक बिलों का भुगतान करना भी इसमें शामिल है।
उनकी अंतिम सहमति ऐसे 60 कामों के लिए बनी। उन्हें 60 प्लेइंग कार्ड्स दिए गए, जिस पर उन्होंने 60 काम लिखे। उन्हें 20 अतिरिक्त कार्ड दिए गए, अगर आने वाले हफ्तों में कुछ काम अतिरिक्त आ जाता है और उन्हें इन कामों को अतिरिक्त कार्ड में लिखने को कहा गया। फिर उन्हें एक छोटी कार्ड बांटने वाली मशीन दी गई जो इन कार्डों को रीशफल करके उन्हें हर हफ्ते या हर महीने में बांटती।
जिसके हिस्से जो भी 30 कार्ड आते, उसे उस काम की पूरी जिम्मेदारी उठानी होती, इसमें उसका कॉन्सेप्ट तैयार करने से लेकर प्लानिंग और अंजाम देना तक शामिल होता। अगर वे आपस में कुछ काम की अदला-बदली करना चाहें, तो यह उन पर निर्भर करता है।
आधुनिक कामकाजी कपल ‘कॉग्निटिव लेबर’ को कुछ इस तरह संभाल रहे हैं, जो कि हमेशा से घर की सीईओ (पढ़ें होम मेकर) की जिम्मेदारी हुआ करती थी और हमारी मांओं के लिए बहुत थकाऊ हो जाता था।
फंडा यह है कि कार्ड खेलते हुए भी कामकाजी कपल घर के कामकाज को आपस में बराबर बांट सकते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से दोनों के बीच एक बॉन्ड भी बनता है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: आधुनिक कपल्स कार्ड्स खेलकर घर के कामकाज बांट रहे हैं!
