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50 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
स्कूल अपने विद्यार्थियों को असल दुनिया के लिए कैसे तैयार कर सकते हैं? यहां एक तरीका है। हालांकि, मैं यह नहीं कह रहा कि यही एकमात्र तरीका है। चलिए शुरू करें। क्लासरूम में बैठे उन बच्चों के पास स्कूल खत्म करके अपने ड्रीम कॉलेज में जाने के लिए दो साल और हैं।
उन सभी ने उत्साह से अपने लैपटॉप खोले, क्योंकि यह क्लास उनके भविष्य के बारे में है और वे अपने भविष्य के आर्किटेक्ट बनने वाले हैं। जी हां, वे अपनी मौजूदा आर्थिक स्थिति और यह असलियत जानने वाले हैं कि अपनी ड्रीम यूनिवर्सिटी या सपनों के राज्य, देश में ग्रेजुएशन के लिए कितने पैसे जरूरी होंगे।
उन्हें पहले ही टीचर से कॉमन स्प्रेडशीट मिल चुकी है, जिनके खुद के लैपटॉप की स्क्रीन स्मार्ट क्लासरूम के स्क्रीन पर दिख रही है। छात्र अपने इनबॉक्स से उस स्प्रेडशीट को मेन स्क्रीन पर लाते हैं। उसमें कई कॉलम हैं और छात्रों को एक-एक करके हर कॉलम भरना है, ताकि वे एडमिशन, रहने, खाने, हॉस्टल और बाकी खर्चों की सालाना लागत पता कर सकें। जैसे ही अनुमानित मासिक और सालाना खर्च सारे लैपटॉप पर दिखता है, क्लासरूम में शोर मच जाता है। क्योंकि ये रकम देख सारे युवा अचंभे में पड़ जाते हैं। टीचर उन पर हंसते हैं।
लागत जोड़ने के बाद उनसे पूछा जाता है कि क्या वे खर्चा कम करने के लिए स्कॉलरशिप एग्जाम में कॉम्पीट करना चाहते हैं। साथ में एक प्लान शीट भी अटैच्ड होती है, जिससे वे प्लान कर सकते हैं कि स्कॉलरशिप एग्जाम में कैसे अच्छा स्कोर किया जाए। इसकी वजह से बच्चों में पढ़ाई की रुचि बढ़ती है। फिर एक बजट ट्रैकर होता है, जिसमें दो कॉलम होते हैं।
इसमें विद्यार्थी 6% ब्याज दर पर एजुकेशन लोन ले सकते हैं और उसकी ईएमआई अपने भविष्य की संभावित सैलरी से कटा सकते हैं। पहले उन्हें अपने संभावित खर्चे भी लिखने होते हैं। टीचर उन्हें बताते हैं कि सैलरी से 12% राशि काम पर आने-जाने के ट्रांसपोर्ट खर्च के लिए अलग रखें।
राज्य, शहर, ऑफिस, लोकल किराया- सब इसमें शामिल होता है। यह क्लास कुछ महीने चलती है ताकि वे उस असल दुनिया की तस्वीर देख सकें, जिसमें वे जीना चाहते हैं। धीरे-धीरे क्लास में उन्हें निवेश, टैक्स, रियल एस्टेट और अन्य जरूरी बातों के बारे में भी बताया जाता है।
अगर आप सोच रहे हैं कि यह कहां हो रहा है तो बता दूं कि अमेरिका के 22 राज्यों ने कक्षाओं में इकोनॉमिक्स की जगह पर्सनल फाइनेंस की पढ़ाई को चुना है। सीमित संसाधनों वाली दुनिया में ज्यादातर स्कूल कॉन्सेप्चुअल के बजाय प्रैक्टिकल एजुकेशन को प्राथमिकता देना चाहते हैं। शॉप क्लासेस में भी इस बदलाव पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि अब ब्लू कॉलर जॉब्स अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं और व्हाइट कॉलर कम हो रहे हैं।
आजकल छात्रों को असल दुनिया में कदम रखते ही कठिन आर्थिक फैसले लेने पड़ते हैं। कई युवा, जो खुद का काम करना चाहते हैं, उन्हें समझाया जाता है कि पैसा उधार लेना कितना आसान है लेकिन चुकाना कितना मुश्किल।
जीवनयापन का खर्च बढ़ाने वाले महामारी या मौजूदा युद्ध जैसे संकटों में संभवत: वे लोग बेहतर आर्थिक फैसले करते हैं, जिन्होंने हाई स्कूल में अनिवार्य तौर पर फाइनेंशियल एजुकेशन ली हो- बजाय उनके, जिन्होंने ये शिक्षा नहीं ली। भले ही पर्सनल फाइनेंस सीखने की कोई अनिवार्य ट्रेनिंग नहीं है, लेकिन बहुत-से लोग इसे चाव से सीख रहे हैं।
फंडा यह है कि संभव हो तो छात्रों को असल दुनिया के लिए तैयार करने के लिए इकोनॉमिक्स की जगह पर्सनल फाइनेंस का विषय पढ़ाएं। क्योंकि दुनिया उम्मीद से अधिक अनिश्चितता भरी हो रही है और बच्चों के लिए यह समझना जरूरी है कि सपने पूरे करने के लिए उन्हें कितने पैसे की जरूरत होगी। यही उन्हें असल आईना दिखाएगा।
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एन. रघुरामन का कॉलम: आजकल के स्कूली बच्चे इकोनॉमिक्स की जगह पर्सनल फाइनेंस चुन रहे हैं




