आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम: हम केवल ‘आत्मनिर्भरता’ पर ही भरोसा नहीं कर सकते Politics & News

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भारत को बदलती हुई विश्व-व्यवस्था का जवाब कैसे देना चाहिए? इसके लिए सबसे पहले एक बड़े सवाल का जवाब देना जरूरी है। यह कि आज दुनिया में भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था का क्या रिश्ता है?
वैश्वीकरण के हालिया दौर में- जिसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई और 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद जिसे मजबूती मिली- आम तौर पर भू-राजनीति अर्थव्यवस्था के पीछे चलती थी और अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से बाजार-आधारित थी। ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय संबंध आर्थिक हितों के आसपास बने थे। दुनिया के मंच पर चीन का उभार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2002 में पश्चिम के समर्थन से, चीन- जो राजनीतिक रूप से कम्युनिस्ट था, लेकिन आर्थिक रूप से कम्युनिस्ट नहीं रह गया था- को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल किया गया। यह याद रखना जरूरी है कि 1972 में चीन-अमेरिका के बीच हुआ शुरुआती मेल-मिलाप पूरी तरह रणनीतिक था, आर्थिक नहीं। उस समय चीन आर्थिक रूप से पिछड़ा था और दुनिया को देने के लिए उसके पास कोई खास उत्पाद नहीं थे। उसका व्यापार/जीडीपी अनुपात सिर्फ 5% था। न ही वह विदेशी निवेश का स्वागत कर रहा था। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने सोवियत संघ को कमजोर करने के लिए चीन को साझेदार के रूप में देखा था, लेकिन 1991 के बाद भी अमेरिका ने चीन से दूरी नहीं बनाई। इसके बजाय, जैसे-जैसे चीन ने अपने बाजार दुनिया के लिए खोले, अर्थव्यवस्था चीन-अमेरिका रिश्ते की बुनियाद बनती गई। बड़े आर्थिक अवसरों ने चीन के अमेरिका और पश्चिम के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाया। देश और कंपनियां तेजी से चीन की ओर दौड़ीं। आज स्थिति यह है कि अर्थव्यवस्था भू-राजनीति के पीछे चलने लगी है, हालांकि वह अभी पूरी तरह से उसके अधीन नहीं हुई है। अगर चीन का डब्ल्यूटीओ में शामिल होना इसका सबसे बड़ा संकेत था कि पहले अर्थव्यवस्था भू-राजनीति पर भारी थी, तो अब ट्रम्प द्वारा टैरिफ को भू-राजनीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना नए दौर का सबसे बड़ा इशारा है। कभी टैरिफ एक आर्थिक औजार हुआ करता था और वैश्वीकरण के दौर में ज्यादातर देश इन्हें न्यूनतम स्तर तक कम करना चाहते थे, लेकिन पिछले एक साल में अमेरिका ने अपने पुराने सहयोगियों पर भी टैरिफ लगाए हैं, क्योंकि अब वह उन्हें ज्यादा काम का नहीं मानता। 1949 में अमेरिका के संरक्षण में पश्चिमी यूरोप को सोवियत संघ से बचाने के लिए बनाए गए नाटो के साथ ट्रम्प का व्यवहार नई भू-राजनीति का अहम उदाहरण है। ग्रीनलैंड से जुड़ी अपनी योजनाओं के लिए ट्रम्प उन नाटो देशों को दंडित करने के लिए भी टैरिफ का इस्तेमाल करने को तैयार थे, जिन्होंने उनका विरोध किया। हालांकि बाद में उन्होंने कदम पीछे खींच लिए। 2028 से 2030 के बीच भारत जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, लेकिन क्या यह रफ्तार आगे भी बनी रह पाएगी? ट्रम्प द्वारा भारत के अमेरिका जाने वाले निर्यात पर ऊंचे टैरिफ लगाना इस समस्या का बड़ा हिस्सा है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका ने पाकिस्तान को अपनाया है और चीन पर उतने कड़े टैरिफ नहीं लगाए, जबकि चीन भी भारत का एक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। ऐसे माहौल में आत्मनिर्भरता की बात करना आकर्षक लगता है, लेकिन यह व्यावहारिक विचार नहीं है। भारत का व्यापार/जीडीपी अनुपात अब बहुत छोटा नहीं है, जैसा कि 1970 के दशक तक था। अब यह 40% से ज्यादा है, यानी भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया से गहराई से जुड़ी हुई है। आज भारत अचानक अपने अंदर ही सिमट नहीं सकता, क्योंकि इससे उसे भारी आर्थिक नुकसान होगा। यह देखते हुए कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद आत्मनिर्भर देशों ने खुद को कितना नुकसान पहुंचाया- जबकि व्यापार पर निर्भर देश (जैसे दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और 1980 के दशक के बाद चीन) आगे बढ़े- आत्मनिर्भरता की लंबी अवधि की उपयोगिता पर भी सवाल उठते हैं। भारत की आर्थिक रणनीति दो हिस्सों वाली होनी चाहिए : बाहर की ओर संतुलन और अंदरूनी नियामक ढांचे को सरल बनाना। भले ही अमेरिका ने कुछ दूरी बना ली हो, भारत को उसके साथ कारोबार करने का रास्ता ढूंढना होगा। साथ ही, दूसरे बड़े बाजारों की तलाश करनी चाहिए, जैसे ईयू और चीन। ईयू के साथ ट्रेड डील सही दिशा में कदम है। रणनीतिक उलझनों के बावजूद चीन को भी छोड़ा नहीं जा सकता। अंदरूनी नियामक ढांचे को सरल बनाना भी इतना ही जरूरी है, मुख्य रूप से कर प्रणाली, जमीन और श्रम बाजार से जुड़े मामलों में। आत्मनिर्भरता की बात करना आकर्षक लगता है, लेकिन यह व्यावहारिक नहीं है। भारत का व्यापार/जीडीपी अनुपात अब बहुत छोटा नहीं है, जैसा कि 1970 के दशक तक था। आज भारत अचानक अपने अंदर ही सिमट नहीं सकता। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम: हम केवल ‘आत्मनिर्भरता’ पर ही भरोसा नहीं कर सकते