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बंगाल अपने अब तक के सबसे विवादास्पद चुनाव की ओर बढ़ रहा है। यह न केवल राज्य में टीएमसी बनाम बीजेपी के समीकरण की परीक्षा लेगा, बल्कि चुनाव आयोग की क्षमताओं को भी कसौटी पर रखेगा। ऐसा कम ही होता है कि मतदाता सूची विवाद के घेरे में हो और उसी दौरान चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी जाए- जबकि चिंतित मतदाताओं और राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव आयोग के दफ्तरों और अदालतों में आपत्तियों की बाढ़ आई हुई हो। हालांकि इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 6 मई को समाप्त हो रहा है। संविधान के तहत, उससे पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी कर नई विधानसभा का गठन करना अनिवार्य है। चुनाव प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले नियम सरल हैं और चुनाव आयोग ने पिछले सात दशकों में राज्य-दर-राज्य बिना किसी खास विवाद के चुनाव सुचारु और शांतिपूर्ण ढंग से कराए हैं। लेकिन इस बार बंगाल में जो चीज प्रक्रिया को प्रभावित करने का खतरा पैदा कर रही है, वह है आयोग का चुनाव से महज पांच महीने पहले एसआईआर शुरू करने का फैसला। इसका औपचारिक कारण घुसपैठियों और अवैध मतदाताओं को हटाना बताया गया था, लेकिन इसके बाद आयोग खुद इस काम के बोझ तले दबता दिखाई दिया। बड़े पैमाने पर नामों में कटौती को लेकर उसका राज्य सरकार से लगातार टकराव भी होता रहा। वर्तमान स्थिति यह है कि करीब 63 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। भ्रम को और बढ़ाते हुए आयोग ने बंगाल के लिए अंडर एडजुडिकेशन नाम से विशेष श्रेणी भी बना दी है। इस सूची में लगभग 60 लाख ऐसे मतदाताओं के नाम शामिल हैं, जिनकी स्थिति संदिग्ध मानी जा रही है। नामों की वर्तनी में अंतर या उम्र से जुड़ी मामूली विसंगतियों जैसे कारणों से उनकी जांच की जा रही है। जब तक आयोग उनको लेकर वास्तविक मतदाता के रूप में संतुष्ट नहीं हो जाता, तब तक वे मतदान के लिए अयोग्य माने जाएंगे। एसआईआर विवादों में इतना घिर गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि शीर्ष अदालत को इस मुद्दे से दूर रहना चाहिए था, क्योंकि एसआईआर मूलतः कार्यपालिका का कार्य है। इसके बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रिया को समय पर पूरा कराने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है। इसके लिए विशेष न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जो इस प्रक्रिया की निगरानी करेंगे। अदालत ने चुनाव आयोग के अधिकारियों और इन विशेष न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि नामांकन वापसी की अंतिम तिथि से सात दिन पहले तक सभी विवादों का निपटारा कर लिया जाए। इसका सीधा अर्थ यह है कि 1.23 करोड़ मतदाताओं का भविष्य तय करना और मतदाता सूची को अंतिम रूप देना अप्रैल के पहले सप्ताह तक अनिवार्य हो गया है। लेकिन सबसे बड़ी जंग समय से है, क्योंकि यह काम बहुत ही बड़ा है। चुनाव तिथियों की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर आयोग ने पांच शीर्ष अधिकारियों- जिनमें मुख्य सचिव भी शामिल थे- का आधी रात को तबादला कर दिया, जिन्हें एसआईआर प्रक्रिया के दौरान असहयोगी माना गया था। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल प्रशासन की लगभग सभी प्रमुख शाखाओं- पुलिस और गृह विभाग सहित- के प्रमुखों की भी बदली की गई है। चुनाव से ठीक पहले आरएन रवि की पश्चिम बंगाल में राज्यपाल के रूप में नियुक्ति ने माहौल को और धुंधला कर दिया है। रवि की छवि हस्तक्षेप करने वाले संवैधानिक प्राधिकारी की रही है। खासकर तमिलनाडु में तो उनका राज्य सरकार के साथ अकसर टकराव होता रहता था, जिससे मुख्यमंत्री एमके स्टालिन उनसे खासे नाराज रहते थे। ऐसा कम ही होता है कि मतदाता सूची विवाद के घेरे में हो और चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी जाए। चिंतित मतदाताओं और दलों की ओर से चुनाव आयोग के दफ्तरों और अदालतों में आपत्तियों की बाढ़ आई हुई है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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आरती जेरथ का कॉलम: मतदाता सूची विवादों में घिरी हुई है और चुनाव सिर पर हैं


