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अभय कुमार दुबे का कॉलम: विपक्ष की एकता में कांग्रेस की ही दिलचस्पी नहीं है Politics & News

अभय कुमार दुबे का कॉलम:  विपक्ष की एकता में कांग्रेस की ही दिलचस्पी नहीं है Politics & News

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3 घंटे पहले

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अभय कुमार दुबे अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर

विपक्ष की एकता ऐसा विषय है, जो साठ के दशक से ही हमारी राजनीति को चिंतित करता रहा है। आजादी के बाद से ही कांग्रेस के बोलबाले के तहत भारत की पार्टी-प्रणाली ‘एक दल-महाप्रबल’ की तर्ज पर चल रही थी। हमेशा लगता था अगर विपक्ष में एकता न हुई तो लोकतंत्र पूरी तरह से कांग्रेसमय हो जाएगा। बीच में जब गठजोड़ सरकारों का दौर आया तो यह चिंता कुछ कम सुनाई देने लगी।

1989 से 2014 तक करीब 35 वर्ष ऐसे गुजरे कि हर पार्टी किसी न किसी गठजोड़ में रह कर सत्ता-सुख उठा रही थी। लेकिन जैसे ही भाजपा ने 2014 के चुनाव के बाद कांग्रेस के पैटर्न पर ‘एक दल-महाप्रबल’ के रूप में उभरना शुरू किया, वैसे ही विपक्षी एकता की चिंताएं फिर जोर पकड़ने लगीं। 2024 के चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन बनाने की कोशिशों ने संकेत दिया था कि अब भाजपा को भी कड़ी लोकतांत्रिक प्रतियोगिता से गुजरना पड़ सकता है।

खास बात यह है कि विपक्ष का यह राष्ट्रीय गठजोड़ कभी संगठनात्मक दृष्टि से औपचारिक रूप नहीं ग्रहण कर पाया, लेकिन इसकी चर्चा और इसका विचार ही अपने-आप में इतना पर्याप्त निकला कि भाजपा लगातार तीसरी बार बहुमत की सरकार नहीं बना पाई। आज भाजपा के पास अगर 240 सीटें हैं, तो इंडिया गठबंधन के पास सबको मिलाकर उससे केवल छह कम यानी 234 सीटें हैं। लेकिन भाजपा एकजुट है और उत्तरोत्तर चुनावी सफलताएं प्राप्त कर रही है।

वहीं इंडिया गठबंधन पहले से भी ज्यादा बिखरा हुआ है। वह ऐसा जमावड़ा बन गया है, जिसका न तो कोई केंद्र है और न ही जिसकी कोई राजनीतिक दिशा है। इस समय वह ज्यादा से ज्यादा संसद में गैर-एनडीए शक्तियों के समन्वय का नाम बनकर रह गया है। अदाणी के मसले पर देखा गया कि यह समन्वय भी बीच-बीच में टूटता रहता है। तो क्या इंडिया का भविष्य अंधकारमय है?

मोटे तौर पर इंडिया गंठबंधन अपने-अपने प्रदेशों में बेहद शक्तिशाली क्षेत्रीय ताकतों का गठजोड़ है, जो एक राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) के जरिए दिल्ली की सत्ता में हिस्सेदारी का दावा कर सकता है। दूसरी तरफ से देखें तो कांग्रेस इन क्षेत्रीय शक्तियों की मदद से दिल्ली में भाजपा को अपदस्थ करने का मंसूबा रखती है। जब दोनों के स्वार्थ मिलते हैं तो फिर यह गठबंधन औपचारिक संरचना क्यों ग्रहण नहीं कर पाया? कांग्रेस चाहती तो पिछले साल की शुरुआत में ही इस गठबंधन का ढांचा खड़ा हो जाता।

दरअसल, जिस दिन कांग्रेस चाहेगी, उसके हफ्ते-दस दिन के भीतर-भीतर इंडिया का एक दफ्तर होगा, एक संयोजक बन जाएगा, एक सचिवालय गठित हो चुकेगा, उसके प्रवक्ताओं की टोली नियुक्त हो जाएगी और उसका न्यूनतम साझा कार्यक्रम कागज पर बन जाएगा। तो कांग्रेस इस तरह की पहलकदमी से परहेज क्यों कर रही है?

जिस समय नीतीश कुमार सारे देश में घूम-घूमकर विपक्ष के नेताओं को एक मंच पर आने के लिए गोलबंद कर रहे थे, उस समय उनकी पीठ पर राहुल, सोनिया और खरगे का खामोश हाथ था। स्पष्ट रूप से उस समय कांग्रेस का आलाकमान इस तरह का मोर्चा बनाना चाहता था और नीतीश उसके अघोषित राजदूत के रूप में काम कर रहे थे।

नीतीश ने बिहार में तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था और उन्हें केंद्रीय राजनीति में अपनी भूमिका की तलाश थी। वे कांग्रेस के साथ मिलकर यह जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हो गए थे। लेकिन लगता है कि जैसे ही कांग्रेस की विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त हुई, आलाकमान का मन बदलना शुरू हो गया। उसे लगने लगा कि अब वह क्षेत्रीय ताकतों के इस गठजोड़ को अपने हिसाब से नियंत्रित नहीं कर पाएगा।

उसके कदम पीछे खींचने का पहला बड़ा संकेत तब मिला, जब स्वयं राहुल ने नीतीश को संयोजक बनाने के प्रस्ताव में इस बहाने से टांग अड़ाई कि इसके लिए ममता और केजरीवाल की सहमति नहीं मिली है। इसने नीतीश का दिल तोड़ दिया, और वे एक बार फिर भाजपा की ओर चले गए। कांग्रेस के असहयोग की स्थिति में नीतीश के लिए राष्ट्रीय राजनीति में कदम जमाना नामुमकिन था। जब तक कांग्रेस विधानसभा चुनाव नहीं जीतेगी, उसके भीतर विपक्ष की राष्ट्रीय एकता का आत्मविश्वास कैसे पैदा होगा?

हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस शुरुआती बढ़त के बावजूद हारी। लोकसभा में उसे सफलता का जो हल्का-सा स्वाद मिला था, वह अब तक खत्म हो चुका है। वह राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से पहले वाली स्थिति में पहुंच गई है। ऐसी स्थिति में विपक्ष की एकता का नेतृत्व कर पाना हाल-फिलहाल तो उसके लिए संभव नहीं रह गया है।

  • जिस दिन कांग्रेस चाहेगी, इंडिया गठबंधन का एक दफ्तर होगा, एक संयोजक बन जाएगा, सचिवालय गठित हो चुकेगा, उसके प्रवक्ताओं की टोली नियुक्त हो जाएगी और उसका न्यूनतम साझा कार्यक्रम कागज पर बन जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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