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अमेरिका यह कभी नहीं मानेगा कि ईरान पर इजराइल की मदद के लिए किए गए उसके हमले का ताल्लुक हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक अदावत से भी है। लेकिन ईरान जिस फारसी सभ्यता की नुमाइंदगी करता है और अमेरिका जिस पश्चिमी सभ्यता का झंडाबरदार है, उनके बीच ईसा के जन्म से पांच सौ साल पहले शुरू हुई शत्रुतापूर्ण होड़ आज तक जारी है। इस संघर्ष के साभ्यतिक पहलू आज तक यूरोपीय और अमेरिकी मानस की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में बार-बार व्यक्त हो रहे हैं। चाहे हॉलीवुड की सुपरहिट फिल्में हों या ओटीटी पर चलने वाली लम्बी-लम्बी शृंखलाएं, 21वीं सदी में भी पश्चिम की तरफ से ईरान के कथित खलनायकत्व और पश्चिम के नायकत्व की यह टकराव-भरी कहानी तरह-तरह से सुनाई जा रही है। यह उस समय की बात है जब न इस्लाम था, न ईसाइयत। पश्चिम जिस ग्रीको-रोमन सभ्यता को अपनी आधारशिला मानता है, उसका पालना यूनान था। यूनानी नगर-राज्यों (एथेंस, स्पार्टा, मेसिडोन और थेब) और तत्कालीन फारसी सम्राटों दारा और जर्कसीज के बीच हुए युद्धों का वृत्तांत हेरोडोटस (यूनानी इतिहासकार) ने अपनी पुस्तक “द हिस्टरीज’ में विस्तार से दर्ज किया है। उस जमाने में ईरानी सभ्यता अपने शहरी चरित्र और नफासत के लिए जानी जाती थी। लेकिन हेरोडोटस ने ईरानियों को बर्बर करार दिया। उन्होंने लिखा कि ईरानी एक ऐसी भाषा (फारसी) बोलते हैं, जो ग्रीक के मुकाबले निकृष्ट है। आज भी पश्चिम यह नैरेटिव चलाता दिखता है कि ईरान पतनशीलता, अंधविश्वास और निरंकुशता का प्रतिनिधि है और पश्चिम लोकतंत्र और खुले समाज का प्रतिनिधित्व करता है। हॉलीवुड ने 2006 और 2014 में दो सुपरहिट फिल्में बनाईं- “300′ और “300 : राइज ऑफ एन एम्पायर’। इनमें फारस की विशाल सेनाओं के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो जाने वाले तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं का कथानक है। इन फिल्मों में भूरी और काली त्वचा वाले एशियाई ईरानियों को अंधकार, लिप्सा और अज्ञान की गिरफ्त में दिखाया गया है। उनके मुकाबले लड़ रहे यूनानियों को सुनहरे बालों वाले श्वेतांग यूरोपियनों की तरह चित्रित किया गया है। फिल्मों में ये यूनानी अनुशासन, नियमबद्धता, मानवीय प्रेम और त्याग के प्रतिनिधि हैं। ये और बात है कि असली जिंदगी में यूनानी लोग एशियाई ज्यादा दिखते हैं और यूरोपियन कम। ज्यादातर यूनानी दार्शनिकों की शिक्षा भी तत्कालीन मिस्र में ही हुई थी। यूनान में कुछ भी यूरोपियन नहीं था। पर इन फिल्मों में यूनानियों की नस्ल बदल दी गई है। इसी तरह से 2014 में एक और फिल्म बनी “अरगो’, जिसका हीरो सीआईए का एजेंट है और जो 1979-1981 के बीच तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में फंसे बंधकों को बचाकर निकाल लाता है। 2020 तक इजराइली भी इस नैरेटिव में कूद पड़े। उन्होंने ओटीटी पर एक सीरियल बनाया “तेहरान’, जिसकी चौबीस किश्तें (तीन सीजन) सुपरहिट रहीं। इसमें मोसाद के एजेंट एक कम्प्यूटर हैकर की मदद से ईरान के एटमी कार्यक्रम को नष्ट करने का अभियान चलाते हैं।
आज की भारतीय आधुनिकता स्वयं को अमेरिका और यूरोप से जुड़ा हुआ महसूस करती है। उसके पास एशिया की दो महान- भारतीय और फारसी सभ्यताओं की सांस्कृतिक एकता की कोई स्मृति शेष नहीं है। आज भारत में ईरान को केवल मुसलमानों के देश के तौर पर ही देखा जाता है। मौजूदा युद्ध एक भारतीय हिंदू की निगाह में पश्चिम की खुली सभ्यता और ईरान के बंद इस्लामिक राज्य में होने वाली टक्कर के अलावा कुछ नहीं है। जबकि आज का ईरान इस युद्ध में केवल अपनी मिसाइलों और ड्रोनों के कारण ही नहीं टिका हुआ है। उसके पास अपनी इस्लाम-पूर्व फारसी सभ्यता और संस्कृति का अदृश्य प्रतीत होने वाला बल भी है। ईरान इस युद्ध में मिसाइलों और ड्रोनों के कारण ही नहीं टिका हुआ है। उसके पास फारसी सभ्यता और संस्कृति का वह अदृश्य प्रतीत होने वाला बल भी है, जो उसे अमेरिका की इतिहासविहीनता का विलोम बना देता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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अभय कुमार दुबे का कॉलम: बहुत पुरानी है फारस और पश्चिम के टकराव की कथा



