याद है वो आधी रात, जब गिरफ्तार हुए लोकतंत्र के पहरेदार


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करनाल। 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को देश में आपातकाल की घोषणा के साथ ही करनाल जिले में भी विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई। सरकार की अनुमति के बिना खबरें छापने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। इस मामले में अदालत से जमानत नहीं मिलती थी। तीन लोकतंत्र सेनानियों रामलाल वधवा, मूलचंद जैन व सरदार रघुवीर सिंह को आधी रात उनके घर से गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। ओमप्रकाश अत्रेजा व कामरेड रामप्यारा पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके।
26 जून की सुबह 11 बजे तक करनाल शहर बंद रहा। पुलिस ने विरोध दर्ज कर रहे लोगों को जेल भेजने की चेतावनी देकर तितर-बितर कर दिया और बाजार खुलवाए। विरोध की चिंगारी नहीं बुझी। इन पांचों लोकतंत्र सेनानियों ने यातनाएं सही और जेल काटी। इसके अलावा करीब 16 और लोगों को डिफेंस ऑफ इंडिया रूल (डीआईआर) के तहत जेल भेजा गया था, इस रूल में जमानत मिल जाती थी। इन सभी को वर्ष 2014 में हरियाणा सरकार ने लोकतंत्र सेनानी मानते हुए 10 हजार रुपये मासिक पेंशन लागू की। करनाल के मीसा मामले को भुगतने वाले पांच लोकतंत्र सेनानियों में से मात्र एक ओमप्रकाश अत्रेजा ही जीवित हैं।
आपातकाल से जुड़ी यादें ताजा करते हुए ओमप्रकाश अत्रेजा बताते हैं कि उनके पिता किशनचंद अत्रेजा को हवालात में डाल दिया। उनके भाई को भी पकड़ लिया। उनकी पत्नी को उपायुक्त कार्यालय में बुलाकर बैठा लिया। परिवार पर दबाव बनाया कि ओमप्रकाश को पेश करें अन्यथा जेल में डाल देंगे। इसके अलावा आपातकाल के दौरान ही महिला व पुरुष नसबंदी करवाने से जनता काफी नाराज थी। संवाद
विधानसभा पर किया था सत्याग्रह
गिरफ्तारी से बचते बचाते छह-सात महीने बाद उन्होंने चंडीगढ़ में विधानसभा पर एक दिन का सत्याग्रह किया। उनके साथ गुलशन भाटिया व झंझाड़ी गांव के राजिंद्र चौधरी भी थे। 23 जून 1976 को उन्हें मीसा एक्ट में पकड़ लिया गया और आपातकाल के विरोध संबंधी प्रचार सामग्री बरामद करने का दबाव बनाया। एमरजेंसी खत्म होने पर 21 मार्च 1977 को वे जेल से छूटे थे।
– ओमप्रकाश अत्रेजा, लोकतंत्र सेनानी
खराब हुई थी भारत की छवि
तब दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की शिक्षा ग्रहण कर रहा था। उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर काबिज रहना चाहती थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट से उनके खिलाफ एक निर्णय आने के बाद कुर्सी के खतरे को भांपते हुए उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति से इमरजेंसी लगवा दी। दिल्ली में त्राहि-त्राहि मच गई थी। इतनी गिरफ्तारियां हुई कि जेलें भर गई, जिससे विश्व में भारत की छवि खराब हुई।
– शिक्षाविद शरतचंद्र भाटिया, नगला रोड़ान
खाली रहते थे अखबारों के कॉलम
आपातकाल लागू होने के एक महीने बाद उनकी शादी हुई। तब इमरजेंसी लगी हुई थी। इसके एक वर्ष बाद उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी टीकाराम सुखन व मां शकुंतला देवी सुखन को जेल में डाल दिया गया। पत्रकारों पर सेंसरशिप लागू थी। सरकार की अनुमति के बिना खबर नहीं छाप सकते थे। अखबारों में कॉलम खाली रहते थे। सरकार का विरोध करना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित था।
– नरेंद्र सुखन, जिलाध्यक्ष, स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन

करनाल। 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को देश में आपातकाल की घोषणा के साथ ही करनाल जिले में भी विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई। सरकार की अनुमति के बिना खबरें छापने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। इस मामले में अदालत से जमानत नहीं मिलती थी। तीन लोकतंत्र सेनानियों रामलाल वधवा, मूलचंद जैन व सरदार रघुवीर सिंह को आधी रात उनके घर से गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। ओमप्रकाश अत्रेजा व कामरेड रामप्यारा पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके।

26 जून की सुबह 11 बजे तक करनाल शहर बंद रहा। पुलिस ने विरोध दर्ज कर रहे लोगों को जेल भेजने की चेतावनी देकर तितर-बितर कर दिया और बाजार खुलवाए। विरोध की चिंगारी नहीं बुझी। इन पांचों लोकतंत्र सेनानियों ने यातनाएं सही और जेल काटी। इसके अलावा करीब 16 और लोगों को डिफेंस ऑफ इंडिया रूल (डीआईआर) के तहत जेल भेजा गया था, इस रूल में जमानत मिल जाती थी। इन सभी को वर्ष 2014 में हरियाणा सरकार ने लोकतंत्र सेनानी मानते हुए 10 हजार रुपये मासिक पेंशन लागू की। करनाल के मीसा मामले को भुगतने वाले पांच लोकतंत्र सेनानियों में से मात्र एक ओमप्रकाश अत्रेजा ही जीवित हैं।

आपातकाल से जुड़ी यादें ताजा करते हुए ओमप्रकाश अत्रेजा बताते हैं कि उनके पिता किशनचंद अत्रेजा को हवालात में डाल दिया। उनके भाई को भी पकड़ लिया। उनकी पत्नी को उपायुक्त कार्यालय में बुलाकर बैठा लिया। परिवार पर दबाव बनाया कि ओमप्रकाश को पेश करें अन्यथा जेल में डाल देंगे। इसके अलावा आपातकाल के दौरान ही महिला व पुरुष नसबंदी करवाने से जनता काफी नाराज थी। संवाद

विधानसभा पर किया था सत्याग्रह

गिरफ्तारी से बचते बचाते छह-सात महीने बाद उन्होंने चंडीगढ़ में विधानसभा पर एक दिन का सत्याग्रह किया। उनके साथ गुलशन भाटिया व झंझाड़ी गांव के राजिंद्र चौधरी भी थे। 23 जून 1976 को उन्हें मीसा एक्ट में पकड़ लिया गया और आपातकाल के विरोध संबंधी प्रचार सामग्री बरामद करने का दबाव बनाया। एमरजेंसी खत्म होने पर 21 मार्च 1977 को वे जेल से छूटे थे।

– ओमप्रकाश अत्रेजा, लोकतंत्र सेनानी

खराब हुई थी भारत की छवि

तब दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की शिक्षा ग्रहण कर रहा था। उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर काबिज रहना चाहती थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट से उनके खिलाफ एक निर्णय आने के बाद कुर्सी के खतरे को भांपते हुए उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति से इमरजेंसी लगवा दी। दिल्ली में त्राहि-त्राहि मच गई थी। इतनी गिरफ्तारियां हुई कि जेलें भर गई, जिससे विश्व में भारत की छवि खराब हुई।

– शिक्षाविद शरतचंद्र भाटिया, नगला रोड़ान

खाली रहते थे अखबारों के कॉलम

आपातकाल लागू होने के एक महीने बाद उनकी शादी हुई। तब इमरजेंसी लगी हुई थी। इसके एक वर्ष बाद उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी टीकाराम सुखन व मां शकुंतला देवी सुखन को जेल में डाल दिया गया। पत्रकारों पर सेंसरशिप लागू थी। सरकार की अनुमति के बिना खबर नहीं छाप सकते थे। अखबारों में कॉलम खाली रहते थे। सरकार का विरोध करना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित था।

– नरेंद्र सुखन, जिलाध्यक्ष, स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन

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Written by Haryanacircle

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