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भागवत महापुराण चारों वेदों के संपूर्ण ज्ञान का सागर


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अंबाला सिटी। भागवत महापुराण में सभी वेदों की व्याख्या की गई है। इसमें सभी भक्तों के लिए संपूर्ण ज्ञान का सागर विराजमान है। मनुष्य को ज्ञान सागर में जाने के लिए माध्यम की जरूरत होती है इसलिए संतों द्वारा दी गई शिक्षा को हृदय में उतार लें। संतों के माध्यम से ही परमात्मा की प्राप्ति करने का मार्ग खुल सकता है। यह प्रवचन सिटी के मानव चौक स्थित श्रीकृष्ण मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने कहे।
दूसरे दिन मास्टर सुभाष, श्रीराम भाटिया प्रधान, राममोहन बत्रा उपप्रधान, बंटी बत्रा, मास्टर रामकिशन शर्मा, राजेश राव, प्रशांत श्यामला आदि समिति के सदस्यों ने कथा व्यास आचार्य सनातन चैतन्य महाराज का भव्य स्वागत किया। वहीं, पंडित रविन्द्र नाथ तिवारी व पंडित सतदेव गौड़ ने विधिपूर्वक पूजन करवाया। कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने कहा कि सर्व पुराणों में भागवत पुराण का बड़ा महत्व है। नैमिषारण्य जहां आज चक्र तीर्थ स्थान है वहीं ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त चक्र गिराया गया था। उसी जगह शौनकादि 88 हजार ऋषि-मुनि एक हजार दिनों के लिए संकल्प लेकर यज्ञ कर रहे थे।
उसी दौरान श्री रोमहर्षण ऋषि के पुत्र सर्व शास्त्रों के महाज्ञानी महात्मा श्री सूत जी महाराज आते हैं। शौनकादि ऋषियों ने आदर पूर्वक श्री सूत जी महाराज से भगवान की कथा श्रवण करने की जिज्ञासा प्रकट की। भागवत में शौनकादि ऋषि छह प्रश्न पूछते हैं। पहला मनुष्यों के लिए श्रेष्ठ मार्ग कौन सा है, दूसरा भगवान अवतार क्यों लेते हैं, सर्वशक्तिमान भगवान अपने लोक को छोड़कर मृत्युलोक में क्यों आते हैं। तीसरा अवतारी पुरुष का क्या कर्तव्य होता है, चौथा भगवान ने कितने अवतार लिए, पांचवां सवाल श्रीकृष्ण के अवतार की कथा विस्तार से श्रवण करवाएं और छठा सवाल जब भगवान श्रीकृष्ण अपने 125 वर्ष पूर्ण कर अपने गोलोक गमन किए तो धर्म किसके शरण में रहा।
भागवत में इन्हीं छह प्रश्नों के जवाब में 12 स्कंध 335 अध्याय व 18 हजार श्लोकों में विस्तार पूर्वक बताया गया है। चारों वेदों के मिश्रण को ही भागवत कहा गया है। भागवत पुराण ज्ञान, वैराग्य व भक्ति को जगाने वाली कथा है। कथा के समापन पर सभी भक्तों ने महाराज द्वारा प्रस्तुत किए गए भजनों का आनंद उठाया। सभी भक्त मंत्रमुग्ध होकर झूमते दिखाई दिए। श्रीमद्भागवत की आरती के पश्चात प्रसाद वितरित किया गया।

अंबाला सिटी। भागवत महापुराण में सभी वेदों की व्याख्या की गई है। इसमें सभी भक्तों के लिए संपूर्ण ज्ञान का सागर विराजमान है। मनुष्य को ज्ञान सागर में जाने के लिए माध्यम की जरूरत होती है इसलिए संतों द्वारा दी गई शिक्षा को हृदय में उतार लें। संतों के माध्यम से ही परमात्मा की प्राप्ति करने का मार्ग खुल सकता है। यह प्रवचन सिटी के मानव चौक स्थित श्रीकृष्ण मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने कहे।

दूसरे दिन मास्टर सुभाष, श्रीराम भाटिया प्रधान, राममोहन बत्रा उपप्रधान, बंटी बत्रा, मास्टर रामकिशन शर्मा, राजेश राव, प्रशांत श्यामला आदि समिति के सदस्यों ने कथा व्यास आचार्य सनातन चैतन्य महाराज का भव्य स्वागत किया। वहीं, पंडित रविन्द्र नाथ तिवारी व पंडित सतदेव गौड़ ने विधिपूर्वक पूजन करवाया। कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने कहा कि सर्व पुराणों में भागवत पुराण का बड़ा महत्व है। नैमिषारण्य जहां आज चक्र तीर्थ स्थान है वहीं ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त चक्र गिराया गया था। उसी जगह शौनकादि 88 हजार ऋषि-मुनि एक हजार दिनों के लिए संकल्प लेकर यज्ञ कर रहे थे।

उसी दौरान श्री रोमहर्षण ऋषि के पुत्र सर्व शास्त्रों के महाज्ञानी महात्मा श्री सूत जी महाराज आते हैं। शौनकादि ऋषियों ने आदर पूर्वक श्री सूत जी महाराज से भगवान की कथा श्रवण करने की जिज्ञासा प्रकट की। भागवत में शौनकादि ऋषि छह प्रश्न पूछते हैं। पहला मनुष्यों के लिए श्रेष्ठ मार्ग कौन सा है, दूसरा भगवान अवतार क्यों लेते हैं, सर्वशक्तिमान भगवान अपने लोक को छोड़कर मृत्युलोक में क्यों आते हैं। तीसरा अवतारी पुरुष का क्या कर्तव्य होता है, चौथा भगवान ने कितने अवतार लिए, पांचवां सवाल श्रीकृष्ण के अवतार की कथा विस्तार से श्रवण करवाएं और छठा सवाल जब भगवान श्रीकृष्ण अपने 125 वर्ष पूर्ण कर अपने गोलोक गमन किए तो धर्म किसके शरण में रहा।

भागवत में इन्हीं छह प्रश्नों के जवाब में 12 स्कंध 335 अध्याय व 18 हजार श्लोकों में विस्तार पूर्वक बताया गया है। चारों वेदों के मिश्रण को ही भागवत कहा गया है। भागवत पुराण ज्ञान, वैराग्य व भक्ति को जगाने वाली कथा है। कथा के समापन पर सभी भक्तों ने महाराज द्वारा प्रस्तुत किए गए भजनों का आनंद उठाया। सभी भक्त मंत्रमुग्ध होकर झूमते दिखाई दिए। श्रीमद्भागवत की आरती के पश्चात प्रसाद वितरित किया गया।

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