प्रकृति के कण-कण में संगीत समाया… इसके बिना जीवन अधूरा


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चंडीगढ़। संगीत के बिना जीवन अधूरा है। संगीत हमारे नीरस जीवन को सरस बना देता है। सृष्टि के कण कण में संगीत है, फिर चाहे यह बहती हुई नदिया की धारा हो या किनारे से टकराकर लौटती समंदर की प्रचंड लहर। बहती हुई हवा और उस पर झूमते-लहराते पत्ते भी हृदय के इसी तरंगित साज को अभिव्यक्ति देते प्रतीत होते हैं। यह बात कश्यप बंधु शास्त्रीय गायक और पंजाब यूनिवर्सिटी के संगीत विभाग सेवा दे रहे डॉ. प्रभाकर कश्यप ने विश्व संगीत दिवस पर कही। कश्यप बंधु डॉ. प्रभाकर और दिवाकर का गायन के क्षेत्र में काफी नाम है। डॉ. कश्यप ने कहा कि संगीत से बीमार व्यक्ति भी स्वस्थ हो जाता है। देवता प्रसन्न हो जाते हैं और प्रकृति भी खिलखिला उठती है। संगीत में दैवीय शक्ति है। यह सब मां सरस्वती की कृपा से ही संभव है।
देश के बंटबारे के समय पिता केवल टूल लेकर आए थे: रोशन दीप सिंह
सेक्टर- 27 के यमुनादास म्यूजिकल इंस्ट्मेंटल के रोशनदीप सिंह ने कहा कि बंटवारे से पहले उनके पिता यमुनादास लाहौर में रहते थे। बंटवारे के बाद पिता परिवार के साथ अंबाला आए थे। उस दौरान पिता के पास टूल के अलावा कुछ भी नहीं था। धीरे धीरे उसी टूल से वाद्ययंत्र बनाना शुरू कर दिया। अब वाद्ययंत्रों के अंबाला और चंडीगढ़ में शोरूम हैं। उन्होंने कहा कि संगीत में बड़ी ताकत होती है। अब तीसरी पीढ़ी भी वाद्ययंत्र के काम में जुट गई है। उन्होंने बताया कि उनका संयुक्त परिवार है और भाई मनमोहन सिंह भ्ी साथ में काम करते हैं।
रोशनदीप सिंह बताते हैं कि बंटवारे से पहले लाहौर के अनारकली बाजार में उनके पिता की वाद्ययंत्र की दुकान थी। उनके पिता यमुनादास ने अपने गुरु पंडित कांशीराम से यह काम सीखा था। उनके पिता से उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार ओपी नैयर से गहरी दोस्ती थी। बड़े गुलाम अली भी आते थे। उस समय तबला, हारमोनियम और तानपुरा बनाते थे। अब करीब हर प्रकार के वाद्ययंत्र बनाते हैं। उनके शोरूम में हरिहरण, अनूप जलोटा सहित कई बड़े कलाकार आते रहते हैं। उनके वाद्ययंत्रों की खराबी ठीक करते हैं। पंजाब के बड़े कलाकार भी शोरूम पर आते हैं। वे हारमोनियम, सितार, तानपुरा, सारंगी, रबाव, दिलरूबा, ईशराज, सरोद की ट्यूनिंग करते हैं।
कश्यप बंधु का परिचय
बिहार के छपरा में जन्मे डॉ. प्रभाकर कश्यप एवं डॉ. दिवाकर कश्यप संगीत परिवार की सातवीं पीढ़ी है। संगीत के क्षेत्र में उन्होंने देशभर में नाम कमाया है। कश्यप बंधु ऑल इंडिया रेडियो प्रसार भारती से ए ग्रेड कलाकार है। वर्तमान में डॉ. दिवाकर कश्यप इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के गायन विभाग में कार्यरत हैं। शास्त्रीय गायक कश्यप बंधु ख्याल, भजन, ठुमरी, दादरा, टप्पा आदि गाने में भी कुशल हैं। इन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं।
कोविड के बाद वाद्ययंत्रों की बिक्री बढ़ी
कोविड के बाद वाद्ययंत्रों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई है। खासकर कीबोर्ड और गिटार की काफी बिक्री बढ़ी है। इन वाद्ययंत्रों के प्रति युवाओं में काफी क्रेज है। यह कहना है वाद्ययंत्र विक्रेता और सेक्टर-27 स्थित शिमला म्यूजिक हाउस के हैरी सिंह का। उन्होंने कहा कि उनके दुकान पर कई बड़े कलाकार आते हैं। उन्होंने कहा कि उनके दादा ने शिमला में काम शुरू किया था। बाद में चंडीगढ़ आ गए।

चंडीगढ़। संगीत के बिना जीवन अधूरा है। संगीत हमारे नीरस जीवन को सरस बना देता है। सृष्टि के कण कण में संगीत है, फिर चाहे यह बहती हुई नदिया की धारा हो या किनारे से टकराकर लौटती समंदर की प्रचंड लहर। बहती हुई हवा और उस पर झूमते-लहराते पत्ते भी हृदय के इसी तरंगित साज को अभिव्यक्ति देते प्रतीत होते हैं। यह बात कश्यप बंधु शास्त्रीय गायक और पंजाब यूनिवर्सिटी के संगीत विभाग सेवा दे रहे डॉ. प्रभाकर कश्यप ने विश्व संगीत दिवस पर कही। कश्यप बंधु डॉ. प्रभाकर और दिवाकर का गायन के क्षेत्र में काफी नाम है। डॉ. कश्यप ने कहा कि संगीत से बीमार व्यक्ति भी स्वस्थ हो जाता है। देवता प्रसन्न हो जाते हैं और प्रकृति भी खिलखिला उठती है। संगीत में दैवीय शक्ति है। यह सब मां सरस्वती की कृपा से ही संभव है।

देश के बंटबारे के समय पिता केवल टूल लेकर आए थे: रोशन दीप सिंह

सेक्टर- 27 के यमुनादास म्यूजिकल इंस्ट्मेंटल के रोशनदीप सिंह ने कहा कि बंटवारे से पहले उनके पिता यमुनादास लाहौर में रहते थे। बंटवारे के बाद पिता परिवार के साथ अंबाला आए थे। उस दौरान पिता के पास टूल के अलावा कुछ भी नहीं था। धीरे धीरे उसी टूल से वाद्ययंत्र बनाना शुरू कर दिया। अब वाद्ययंत्रों के अंबाला और चंडीगढ़ में शोरूम हैं। उन्होंने कहा कि संगीत में बड़ी ताकत होती है। अब तीसरी पीढ़ी भी वाद्ययंत्र के काम में जुट गई है। उन्होंने बताया कि उनका संयुक्त परिवार है और भाई मनमोहन सिंह भ्ी साथ में काम करते हैं।

रोशनदीप सिंह बताते हैं कि बंटवारे से पहले लाहौर के अनारकली बाजार में उनके पिता की वाद्ययंत्र की दुकान थी। उनके पिता यमुनादास ने अपने गुरु पंडित कांशीराम से यह काम सीखा था। उनके पिता से उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार ओपी नैयर से गहरी दोस्ती थी। बड़े गुलाम अली भी आते थे। उस समय तबला, हारमोनियम और तानपुरा बनाते थे। अब करीब हर प्रकार के वाद्ययंत्र बनाते हैं। उनके शोरूम में हरिहरण, अनूप जलोटा सहित कई बड़े कलाकार आते रहते हैं। उनके वाद्ययंत्रों की खराबी ठीक करते हैं। पंजाब के बड़े कलाकार भी शोरूम पर आते हैं। वे हारमोनियम, सितार, तानपुरा, सारंगी, रबाव, दिलरूबा, ईशराज, सरोद की ट्यूनिंग करते हैं।

कश्यप बंधु का परिचय

बिहार के छपरा में जन्मे डॉ. प्रभाकर कश्यप एवं डॉ. दिवाकर कश्यप संगीत परिवार की सातवीं पीढ़ी है। संगीत के क्षेत्र में उन्होंने देशभर में नाम कमाया है। कश्यप बंधु ऑल इंडिया रेडियो प्रसार भारती से ए ग्रेड कलाकार है। वर्तमान में डॉ. दिवाकर कश्यप इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के गायन विभाग में कार्यरत हैं। शास्त्रीय गायक कश्यप बंधु ख्याल, भजन, ठुमरी, दादरा, टप्पा आदि गाने में भी कुशल हैं। इन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं।

कोविड के बाद वाद्ययंत्रों की बिक्री बढ़ी

कोविड के बाद वाद्ययंत्रों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई है। खासकर कीबोर्ड और गिटार की काफी बिक्री बढ़ी है। इन वाद्ययंत्रों के प्रति युवाओं में काफी क्रेज है। यह कहना है वाद्ययंत्र विक्रेता और सेक्टर-27 स्थित शिमला म्यूजिक हाउस के हैरी सिंह का। उन्होंने कहा कि उनके दुकान पर कई बड़े कलाकार आते हैं। उन्होंने कहा कि उनके दादा ने शिमला में काम शुरू किया था। बाद में चंडीगढ़ आ गए।

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Written by Haryanacircle

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