पंजाब यूनिवर्सिटी: प्रोफेसर वालिया ने 35 वर्षों में तितली और पतंगा की 200 से अधिक प्रजातियां खोजीं


कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: ajay kumar
Updated Mon, 20 Jun 2022 11:53 AM IST

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पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. विरिंदर कुमार वालिया ने पिछले 35 सालों में तितली और पतंगा की 200 से अधिक प्रजातियां खोजी हैं। उनकी यह खोज अब नए शोधार्थियों के लिए शोध का विषय बनेगी। प्रो. वालिया डेढ़ वर्ष पहले पीयू से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वे अपने जीवन की शोध की पूंजी भारत सरकार की ओर से संचालित जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को दान दे रहे हैं, ताकि तितलियों और पतंगा के इन नमूनों को देश और विदेश के लोग देख सकें और शोधार्थियों व जूलॉजी के छात्रों को इनकी जानकारी मिले।


 
67 वर्षीय डॉ. विरिंदर वालिया ने अपनी पीयू लैब में काम करते हुए बताया कि इन तितलियों और पतंगों की परिवार की तरह देखभाल करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अभी लैब में इनकी संभाल के लिए आता हूं। चूंकि अभी पीयू में इस विषय पर कोई शोध नहीं कर रहा है, इसलिए इनकी संभाल और देश के शोधार्थियों की मदद के लिए इन्हें जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) को दान कर रहा हूं। वहां तितलियों और पतंगों के ये नमूने सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा कि जब से विभाग से सेवानिवृत्ति हुए हैं, तब से हर समय इनकी सुरक्षा की चिंता लगी रहती है। ये पीयू की धरोहर है, जेडएसआई में ये सुरक्षित रहेगी और समाज के काम भी आएगी। 

6000 पतंगा और तितलियों के नमूने कर चुके हैं दान  
डॉ. वालिया ने बताया कि जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को वे अभी तक 6000 पतंगा और तितलियों के नमूने दान कर चुके हैं। दिसबंर 2020 से उन्होंने दान की प्रक्रिया शुरू की है। अभी उनकी लैब में हजारों नमूने और पड़े है जिन्हें दान किया जाना है, इसकी प्रक्रिया चल रही है। दान किए गए नमूनों में पतंगा के 5523 नमूने और 150 से अधिक प्रजातियां हैं। 

वहीं तितलियों की 19 से अधिक प्रजातियां दान की है। ये सब नमूने वर्ष 1976 के बाद एकत्रित किए गए हैं। शोध के लिए पतंगे और तितली को इथाइल एस्टेट से मृत किया जाता है। इसके बाद नैफ्थलिन की मदद से इनकी संभाल की जाती है। हर तीन या चार माह बाद इन नमूनों पर नैफ्थलिन का इस्तेमाल करना पड़ता है जिससे ये खराब नहीं हों। ये नमूने देखने में असली तितली और पतंगे की तरह ही दिखते हैं। इन्हें धूप से भी बचाकर रखना पड़ता है।

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पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. विरिंदर कुमार वालिया ने पिछले 35 सालों में तितली और पतंगा की 200 से अधिक प्रजातियां खोजी हैं। उनकी यह खोज अब नए शोधार्थियों के लिए शोध का विषय बनेगी। प्रो. वालिया डेढ़ वर्ष पहले पीयू से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वे अपने जीवन की शोध की पूंजी भारत सरकार की ओर से संचालित जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को दान दे रहे हैं, ताकि तितलियों और पतंगा के इन नमूनों को देश और विदेश के लोग देख सकें और शोधार्थियों व जूलॉजी के छात्रों को इनकी जानकारी मिले।

 

67 वर्षीय डॉ. विरिंदर वालिया ने अपनी पीयू लैब में काम करते हुए बताया कि इन तितलियों और पतंगों की परिवार की तरह देखभाल करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अभी लैब में इनकी संभाल के लिए आता हूं। चूंकि अभी पीयू में इस विषय पर कोई शोध नहीं कर रहा है, इसलिए इनकी संभाल और देश के शोधार्थियों की मदद के लिए इन्हें जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) को दान कर रहा हूं। वहां तितलियों और पतंगों के ये नमूने सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा कि जब से विभाग से सेवानिवृत्ति हुए हैं, तब से हर समय इनकी सुरक्षा की चिंता लगी रहती है। ये पीयू की धरोहर है, जेडएसआई में ये सुरक्षित रहेगी और समाज के काम भी आएगी। 

6000 पतंगा और तितलियों के नमूने कर चुके हैं दान  

डॉ. वालिया ने बताया कि जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को वे अभी तक 6000 पतंगा और तितलियों के नमूने दान कर चुके हैं। दिसबंर 2020 से उन्होंने दान की प्रक्रिया शुरू की है। अभी उनकी लैब में हजारों नमूने और पड़े है जिन्हें दान किया जाना है, इसकी प्रक्रिया चल रही है। दान किए गए नमूनों में पतंगा के 5523 नमूने और 150 से अधिक प्रजातियां हैं। 

वहीं तितलियों की 19 से अधिक प्रजातियां दान की है। ये सब नमूने वर्ष 1976 के बाद एकत्रित किए गए हैं। शोध के लिए पतंगे और तितली को इथाइल एस्टेट से मृत किया जाता है। इसके बाद नैफ्थलिन की मदद से इनकी संभाल की जाती है। हर तीन या चार माह बाद इन नमूनों पर नैफ्थलिन का इस्तेमाल करना पड़ता है जिससे ये खराब नहीं हों। ये नमूने देखने में असली तितली और पतंगे की तरह ही दिखते हैं। इन्हें धूप से भी बचाकर रखना पड़ता है।

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Written by Haryanacircle

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