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खेलने की उम्र में एनीमिया के शिकार हो रहे बच्चे, शादीशुदा महिलाएं भी इससे ग्रस्त


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यमुनानगर। बच्चों की जो उम्र खेलने कूदने की होती है, उसमें यदि वह थका-थका रहता व उसके चेहरे पर रौनक नहीं है तो आपको उसकी सेहत के प्रति गंभीर हो जाना चाहिए। इस तरह के लक्षण वाले बच्चे एनीमिया यानी खून की कमी का शिकार हो सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग ने शहर व ग्रामीण इलाकों में जाकर बच्चों में खून की जांच की। जांच में 12.2 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से पीड़ित मिले हैं। केवल बच्चे ही नहीं बल्कि शादीशुदा, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली 10.61 प्रतिशत महिलाओं में भी खून की कमी पाई गई है।
कुल 2,79,971 बच्चों और महिलाओं की हुई जांच
स्वास्थ्य विभाग ने एनीमिया मुक्त हरियाणा के तहत जिले में एक जून तक 2,79,971 बच्चों व महिलाओं में खून की जांच की। एनीमिया पीड़ित मां से जन्मे बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर हो सकते हैं। बचपन में एनीमिया होने पर बच्चों के सीखने की क्षमता और अन्य गतिविधियों पर असर पड़ता है।
एनीमिया के लक्षण
बच्चे की त्वचा का पीला पड़ना, थकान और कमजोरी, आलस का अनुभव, भागदौड़ भाग करने पर बच्चा हांफने लगता है और उसे सांस लेने में कठिनाई होती है। एनीमिया से पीड़ित बच्चों में इंफेक्शन भी बड़ी आसानी से लगता है। लंबे समय तक आयरन की कमी से बच्चे में एकाग्रता की कमी, पढ़ाई में मन नहीं लगना जैसी समस्या आ सकती है।
बचाव के तरीके
एनीमिया से बचाव के लिए हरे पत्तेदार सब्जियों, दालों, सूखे मेवे और फल का अधिक सेवन करना चाहिए। विटामिन ए और सी युक्त खाद्य पदार्थ खाने चाहिए। छह माह से लेकर पांच साल तक के बच्चों को सप्ताह में दो बार एक एमएल आयरन सिरप और 5 से 10 साल के बच्चों को हर सप्ताह में बच्चों वाली एक आयरन की गोली खिलानी चाहिए।
इस कैटेगरी में की गई जांच
– 6 माह से 59 माह तक के 54,010 बच्चों की जांच की गई। इनमें से 15,151 बच्चों में 11.9 ग्राम से अधिक, 14,206 बच्चों में 11 से 11.9 ग्राम, 21,144 बच्चों में 8 से 10.9 ग्राम व 3509 बच्चों में 8 ग्राम से कम खून मिला। इनमें 6.5 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से ग्रस्त मिले।
– इसी तरह 5 साल से 9 साल तक के 70,976 बच्चों में खून की जांच की गई। इनमें से 20,367 बच्चों में 8 से 10.9 ग्राम खून व 2125 बच्चों में 8 ग्राम से कम खून मिला है। इनमें से 3 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार हैं।
– 10 से 19 साल तक के 1,01,238 किशोरों व युवाओं की जांच की गई। इनमें से 27,264 में 8 से 10.9 ग्राम व 2,716 में 8 ग्राम से कम खून मिला। इस उम्र के 2.7 प्रतिशत किशोर एनीमिया से पीड़ित हैं।
– जो महिलाएं बच्चों को दूध नहीं पिलाती हैं ऐसी 20 से 24 साल उम्र की 30,595 महिलाओं में खून की जांच की गई। इनकी स्थिति काफी चिंताजनक है। इनमें से 10,064 महिलाओं में 8 से 10.9 ग्राम तथा 2056 महिलाओं में 8 ग्राम से कम खून मिला। इस उम्र में 6.7 प्रतिशत में खून की कमी पाई गई।
– 20 से 24 साल की उम्र में ही गर्भवती व दूध पिलाने वाली 23,152 महिलाओं में से 6,933 में 8 से 10.9 ग्राम तथा 905 महिलाओं में 8 ग्राम से कम खून मिला। इस तरह 3.91 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की गिरफ्त में हैं।
खून की कमी पूरी हो सकती है : डॉ. विजय परमार
डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. विजय परमार का कहना है कि बच्चों को पोषित आहार न मिलना, खून का न बनना, मिट्टी खाना, मां का दूध कम पीना, पेट में कीड़े होना तथा महिलाओं में माहवारी के दौरान अधिक खून बहना, थैलेसीमिया, गर्भावस्था में उचित आहार न मिलना खून की कमी के मुख्य कारण हैं। जरूरी दवाएं लेने से खून की कमी पूरी हो सकती है। रादौर क्षेत्र में एनीमिया ग्रस्त 1960 का उपचार किया गया। दोबारा जांच करने पर उनमें आठ ग्राम से अधिक खून पाया गया। इसमें सही समय पर उपचार की जरूरत है।

यमुनानगर। बच्चों की जो उम्र खेलने कूदने की होती है, उसमें यदि वह थका-थका रहता व उसके चेहरे पर रौनक नहीं है तो आपको उसकी सेहत के प्रति गंभीर हो जाना चाहिए। इस तरह के लक्षण वाले बच्चे एनीमिया यानी खून की कमी का शिकार हो सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग ने शहर व ग्रामीण इलाकों में जाकर बच्चों में खून की जांच की। जांच में 12.2 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से पीड़ित मिले हैं। केवल बच्चे ही नहीं बल्कि शादीशुदा, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली 10.61 प्रतिशत महिलाओं में भी खून की कमी पाई गई है।

कुल 2,79,971 बच्चों और महिलाओं की हुई जांच

स्वास्थ्य विभाग ने एनीमिया मुक्त हरियाणा के तहत जिले में एक जून तक 2,79,971 बच्चों व महिलाओं में खून की जांच की। एनीमिया पीड़ित मां से जन्मे बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर हो सकते हैं। बचपन में एनीमिया होने पर बच्चों के सीखने की क्षमता और अन्य गतिविधियों पर असर पड़ता है।

एनीमिया के लक्षण

बच्चे की त्वचा का पीला पड़ना, थकान और कमजोरी, आलस का अनुभव, भागदौड़ भाग करने पर बच्चा हांफने लगता है और उसे सांस लेने में कठिनाई होती है। एनीमिया से पीड़ित बच्चों में इंफेक्शन भी बड़ी आसानी से लगता है। लंबे समय तक आयरन की कमी से बच्चे में एकाग्रता की कमी, पढ़ाई में मन नहीं लगना जैसी समस्या आ सकती है।

बचाव के तरीके

एनीमिया से बचाव के लिए हरे पत्तेदार सब्जियों, दालों, सूखे मेवे और फल का अधिक सेवन करना चाहिए। विटामिन ए और सी युक्त खाद्य पदार्थ खाने चाहिए। छह माह से लेकर पांच साल तक के बच्चों को सप्ताह में दो बार एक एमएल आयरन सिरप और 5 से 10 साल के बच्चों को हर सप्ताह में बच्चों वाली एक आयरन की गोली खिलानी चाहिए।

इस कैटेगरी में की गई जांच

– 6 माह से 59 माह तक के 54,010 बच्चों की जांच की गई। इनमें से 15,151 बच्चों में 11.9 ग्राम से अधिक, 14,206 बच्चों में 11 से 11.9 ग्राम, 21,144 बच्चों में 8 से 10.9 ग्राम व 3509 बच्चों में 8 ग्राम से कम खून मिला। इनमें 6.5 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से ग्रस्त मिले।

– इसी तरह 5 साल से 9 साल तक के 70,976 बच्चों में खून की जांच की गई। इनमें से 20,367 बच्चों में 8 से 10.9 ग्राम खून व 2125 बच्चों में 8 ग्राम से कम खून मिला है। इनमें से 3 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार हैं।

– 10 से 19 साल तक के 1,01,238 किशोरों व युवाओं की जांच की गई। इनमें से 27,264 में 8 से 10.9 ग्राम व 2,716 में 8 ग्राम से कम खून मिला। इस उम्र के 2.7 प्रतिशत किशोर एनीमिया से पीड़ित हैं।

– जो महिलाएं बच्चों को दूध नहीं पिलाती हैं ऐसी 20 से 24 साल उम्र की 30,595 महिलाओं में खून की जांच की गई। इनकी स्थिति काफी चिंताजनक है। इनमें से 10,064 महिलाओं में 8 से 10.9 ग्राम तथा 2056 महिलाओं में 8 ग्राम से कम खून मिला। इस उम्र में 6.7 प्रतिशत में खून की कमी पाई गई।

– 20 से 24 साल की उम्र में ही गर्भवती व दूध पिलाने वाली 23,152 महिलाओं में से 6,933 में 8 से 10.9 ग्राम तथा 905 महिलाओं में 8 ग्राम से कम खून मिला। इस तरह 3.91 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की गिरफ्त में हैं।

खून की कमी पूरी हो सकती है : डॉ. विजय परमार

डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. विजय परमार का कहना है कि बच्चों को पोषित आहार न मिलना, खून का न बनना, मिट्टी खाना, मां का दूध कम पीना, पेट में कीड़े होना तथा महिलाओं में माहवारी के दौरान अधिक खून बहना, थैलेसीमिया, गर्भावस्था में उचित आहार न मिलना खून की कमी के मुख्य कारण हैं। जरूरी दवाएं लेने से खून की कमी पूरी हो सकती है। रादौर क्षेत्र में एनीमिया ग्रस्त 1960 का उपचार किया गया। दोबारा जांच करने पर उनमें आठ ग्राम से अधिक खून पाया गया। इसमें सही समय पर उपचार की जरूरत है।

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