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आजादी आंदोलन में अमिट है लिवासपुर का योगदान


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आजादी के लिए लाखों देशवासियों ने अपनी कुर्बानी दी थी। कोई गांधी के साथ आंदोलनों में शामिल होकर जेल गया तो कोई घर पर रहकर अप्रत्यक्ष सहयोग करता रहा। भारत के इतिहास में उन क्रांतिकारियों, आंदोलनकारियों का नाम अमिट है। लिवासपुर के ग्रामीणों ने भी आजादी के पहले आंदोलन में अपना कर्त्तव्य निभाया था। अंग्रेजों को सबसे पहले पुराने रोहतक जिले के गांव लिवासपुर के चौधरी उदमीराम नंबरदार ने लगान देने से इंकार किया था। जब लगान वसूलने के लिए तीन अंग्रेज अधिकारी बहालगढ़ पहुंचे तो उदमी नंबरदार ने तीनों को मौत की नींद सुला दिया था। उसके बाद अंग्रेजों का सितम गांव टूटा था। अंग्रेजों ने उदमीराम व उनके साथियों को शहीद कर इस गांव को उजाड़ दिया था। आज भी देश में लिवासपुर को शहीद चौधरी उदमीराम नंबरदार के गांव के रूप में जाना जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने शासनकाल में इस गांव को आदर्श गांव बनाया था। गांव के मुख्य गेट का नामकरण शहीद उदमीराम के नाम पर किया था।
सोनीपत शहर से महज सात किलोमीटर दूर गांव लिवासपुर सन् 1857 की क्रांति में देशभर की नजरों में आया था। जब पहली बार देश में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठ रही थी तो लिवासपुर के नंबरदार चौधरी उदमीराम भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। उन्होंने हरियाणा में सबसे पहले अंग्रेजों को लगान देने से मना कर दिया था। नंबरदार उदमीराम को जब पता चला कि तीन अंग्रेज अधिकारी बहालगढ़ में लगान वसूलने आ रहे हैं तो उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर तीनों को मौत की नींद सुला दिया था। उसके बाद अंग्रेजों का गांव वालों पर बहुत सितम ढाया। अंग्रेजी ने उदमीराम को गांव राई स्थित विश्राम गृह में पीपल के पेड़ से बांधकर उनके शरीर में लोहे की कील ठोक दी थी। करीब 35 दिन तड़पकर उनकी मौत हो गई थी। इतना ही नहीं उदमीराम के 22 साथियों को अंग्रेजों ने एक पत्थर के कोल्हू से कुचलकर मार दिया था। जिनमें जसराम, रामभज, सहजराम सहित अन्य शामिल थे। अंग्रेजों ने गांव को ही उजाड़ दिया था।
अंग्रेज को मारा, पत्नी को छोड़ा
उदमीराम और उनके संगठन में शामिल 22 सदस्य शेरशाह सूरी मार्ग से गुजरने वाले अंग्रेजों को मौत के घाट उतार देते थे। एक दिन उन्होंने एक अंग्रेज और उसकी पत्नी को पकड़ लिया था। उन्होंने अंग्रेज को मार कर उसकी पत्नी को बहालगढ़ में एक महिला को सौंप दिया था। हालांकि बाद में अंग्रेज महिला ने लालच दिया कि उसे अगर पानीपत कैंप में भेज दिया गया तो वह उन्हें इनाम दिलाएगी। जिस पर उसे बहालगढ़ की महिला की मदद से पानीपत पहुंचा दिया गया था। क्रांति समाप्त होने के बाद अंग्रेजों की सेना ने लिवासपुर पर हमला कर दिया था। वीरतापूर्वक लड़ने के बाद उदमीराम व उनके साथी पराजित हो गए थे। जिसके बाद अंग्रेजी ने उन्हें सड़क पर लेटाकर कर कोल्हू से कुचल दिया था। उदमीराम को पेड़ से बांधकर भूख-प्यासा तड़पकर मरने के लिए छोड़ दिया था।
लहवा नाम के किसान ने बसाया था लिवासपुर
ग्रामीण अतर सिंह ने बताया कि गांव लिवासपुर का नाम लहवा किसान के नाम पर है। उन्होंने गांव को करीब दो सौ साल पहले बसाया था। वह पड़ोस के गांव राठधाना से आए थे। सन् 1857 में इस गांव को उजाड़ने का प्रयास किया गया था। लेकिन कुछ परिवार रह गए थे। 1857 में कुछ परिवार यहां से गांव पट्टी कलियाना व कुछ जींद चले गए थे। जो यहां रह गए थे उन्हीं के वंशज आज लिवासपुर गांव में हैं। इस गांव में सरोहा गोत्र के लोग हैं। गांव में करीब 22 सौ एकड़ जमीन है।
आज भी देवीलाल पार्क में रखा हुआ है खूनी कोल्हू
गांव लिवासपुर के 22 ग्रामीणों की शहादत का गवाह वह खूनी कोल्हू आज भी देवीलाल पार्क में रखा हुआ है। इस कोल्हू को देखने के लिए देशभर से पर्यटक आते हैं। सरकार ने भी कोल्हू पर शहीद उदमीराम की शहादत की पूरी कहानी का बोर्ड लगा रखा है।

गांव कुमासपुर के पास ताऊ देवीलाल पार्क में रखा पत्थर का कोल्हू, जिससे अंग्रेजों ने गांव लिवासपुर

गांव कुमासपुर के पास ताऊ देवीलाल पार्क में रखा पत्थर का कोल्हू, जिससे अंग्रेजों ने गांव लिवासपुर – फोटो : Sonipat

आजादी के लिए लाखों देशवासियों ने अपनी कुर्बानी दी थी। कोई गांधी के साथ आंदोलनों में शामिल होकर जेल गया तो कोई घर पर रहकर अप्रत्यक्ष सहयोग करता रहा। भारत के इतिहास में उन क्रांतिकारियों, आंदोलनकारियों का नाम अमिट है। लिवासपुर के ग्रामीणों ने भी आजादी के पहले आंदोलन में अपना कर्त्तव्य निभाया था। अंग्रेजों को सबसे पहले पुराने रोहतक जिले के गांव लिवासपुर के चौधरी उदमीराम नंबरदार ने लगान देने से इंकार किया था। जब लगान वसूलने के लिए तीन अंग्रेज अधिकारी बहालगढ़ पहुंचे तो उदमी नंबरदार ने तीनों को मौत की नींद सुला दिया था। उसके बाद अंग्रेजों का सितम गांव टूटा था। अंग्रेजों ने उदमीराम व उनके साथियों को शहीद कर इस गांव को उजाड़ दिया था। आज भी देश में लिवासपुर को शहीद चौधरी उदमीराम नंबरदार के गांव के रूप में जाना जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपने शासनकाल में इस गांव को आदर्श गांव बनाया था। गांव के मुख्य गेट का नामकरण शहीद उदमीराम के नाम पर किया था।

सोनीपत शहर से महज सात किलोमीटर दूर गांव लिवासपुर सन् 1857 की क्रांति में देशभर की नजरों में आया था। जब पहली बार देश में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठ रही थी तो लिवासपुर के नंबरदार चौधरी उदमीराम भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। उन्होंने हरियाणा में सबसे पहले अंग्रेजों को लगान देने से मना कर दिया था। नंबरदार उदमीराम को जब पता चला कि तीन अंग्रेज अधिकारी बहालगढ़ में लगान वसूलने आ रहे हैं तो उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर तीनों को मौत की नींद सुला दिया था। उसके बाद अंग्रेजों का गांव वालों पर बहुत सितम ढाया। अंग्रेजी ने उदमीराम को गांव राई स्थित विश्राम गृह में पीपल के पेड़ से बांधकर उनके शरीर में लोहे की कील ठोक दी थी। करीब 35 दिन तड़पकर उनकी मौत हो गई थी। इतना ही नहीं उदमीराम के 22 साथियों को अंग्रेजों ने एक पत्थर के कोल्हू से कुचलकर मार दिया था। जिनमें जसराम, रामभज, सहजराम सहित अन्य शामिल थे। अंग्रेजों ने गांव को ही उजाड़ दिया था।

अंग्रेज को मारा, पत्नी को छोड़ा

उदमीराम और उनके संगठन में शामिल 22 सदस्य शेरशाह सूरी मार्ग से गुजरने वाले अंग्रेजों को मौत के घाट उतार देते थे। एक दिन उन्होंने एक अंग्रेज और उसकी पत्नी को पकड़ लिया था। उन्होंने अंग्रेज को मार कर उसकी पत्नी को बहालगढ़ में एक महिला को सौंप दिया था। हालांकि बाद में अंग्रेज महिला ने लालच दिया कि उसे अगर पानीपत कैंप में भेज दिया गया तो वह उन्हें इनाम दिलाएगी। जिस पर उसे बहालगढ़ की महिला की मदद से पानीपत पहुंचा दिया गया था। क्रांति समाप्त होने के बाद अंग्रेजों की सेना ने लिवासपुर पर हमला कर दिया था। वीरतापूर्वक लड़ने के बाद उदमीराम व उनके साथी पराजित हो गए थे। जिसके बाद अंग्रेजी ने उन्हें सड़क पर लेटाकर कर कोल्हू से कुचल दिया था। उदमीराम को पेड़ से बांधकर भूख-प्यासा तड़पकर मरने के लिए छोड़ दिया था।

लहवा नाम के किसान ने बसाया था लिवासपुर

ग्रामीण अतर सिंह ने बताया कि गांव लिवासपुर का नाम लहवा किसान के नाम पर है। उन्होंने गांव को करीब दो सौ साल पहले बसाया था। वह पड़ोस के गांव राठधाना से आए थे। सन् 1857 में इस गांव को उजाड़ने का प्रयास किया गया था। लेकिन कुछ परिवार रह गए थे। 1857 में कुछ परिवार यहां से गांव पट्टी कलियाना व कुछ जींद चले गए थे। जो यहां रह गए थे उन्हीं के वंशज आज लिवासपुर गांव में हैं। इस गांव में सरोहा गोत्र के लोग हैं। गांव में करीब 22 सौ एकड़ जमीन है।

आज भी देवीलाल पार्क में रखा हुआ है खूनी कोल्हू

गांव लिवासपुर के 22 ग्रामीणों की शहादत का गवाह वह खूनी कोल्हू आज भी देवीलाल पार्क में रखा हुआ है। इस कोल्हू को देखने के लिए देशभर से पर्यटक आते हैं। सरकार ने भी कोल्हू पर शहीद उदमीराम की शहादत की पूरी कहानी का बोर्ड लगा रखा है।

गांव कुमासपुर के पास ताऊ देवीलाल पार्क में रखा पत्थर का कोल्हू, जिससे अंग्रेजों ने गांव लिवासपुर

गांव कुमासपुर के पास ताऊ देवीलाल पार्क में रखा पत्थर का कोल्हू, जिससे अंग्रेजों ने गांव लिवासपुर – फोटो : Sonipat

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